फिर लौटकर आऊँगी

प्रियतम,

सहज नहीं है, तुम्हारे प्रति प्रेम को मात्र शब्दों में परिभाषित करना, जैसे सहज नहीं है तुम्हारे नाम को हृदय की धमनियों के स्पंदन से परिमापित करना।

क्योंकि प्रेम परिभाषित नहीं होता मात्र शब्दों से… मेरे प्रेम को परिभाषित करने के लिए, तुम्हें लाने होंगे संसार के समस्त पाषाण क्योंकि इतिहास की सारी अमर प्रेम कथाएँ पाषाणों पर ही गढ़ी हुई हैं पर श्वेत पत्थरों पर रची कथाएँ कहीं समय के साथ मलिन ना हो जाएँ इसीलिए तुम्हें एकत्रित करने होंगे अनेक पलाश के पुष्प। जिस दिन संसार के सभी पाषाण प्रेम के केसरिया रंग में डूब जाएँगे ना, तब स्थापित होगी प्रेम की शिलाएँ।

प्रेम की शिलाएँ जीवंत रहेगी, जन्म जन्मांतर तक और हर जन्म हम लिखेंगे नयी प्रेम कथाएँ, पर फिर भी मेरे शब्द अपूर्ण ही रहेंगे और अपूर्ण रहेगा मेरा प्रेम क्योंकि प्रेम की परिपूर्णता के लिए परिपूर्ण बनना होगा शिव-गौरी सा।

तुम सती के वियोग में शिव-सा समर्पण दिखाना और मैं पार्वती बनकर फिर लौटूँगी और फिर परिपूर्ण होगा हमारा शाश्वत प्रेम!!

शंकर सा तुम प्रण करो, मैं प्रेम समर्पित कर जाऊँ,
मिले सुहाग माँ गौरी सा, तुम्हें जन्म जन्मांतर पाऊँ।

यहाँ जन्म जन्मांतर में तुम्हें पाने का वर तो माँग लिया पर एक वर मैं तुमसे भी माँगती हूँ जब भी इस संसार से विदा लूँ, पूरे सोलह शृंगार के साथ बस तुम्हारे काँधे पर ही लूँ।

जब अंतकाल परिलक्षित हो, जीवन कुछ भी न शेष बचे
प्रेम विरह के गीतों में, जब राग बचे ना द्वेष बचे
मेरे अधरों पर मुस्कान भी जब, स्मृति निनिर्मेष बचे
श्वासों की टूटी माला में तब, मैं प्रेमिल क्षण बचाऊँगी
जिस काँधे पे चढ़ आयी थी, उस काँधे पे ही जाऊँगी
धैर्य धरना तुम हे प्रिये, मैं फिर से लौटकर आऊँगी।

छलकते नैनों से तुम जब, मुझसे अंतिम रज़ा लोगे
तुम बिछुआ, बिंदी, सिंदूरी, आभा से देह सजा लोगे
सौभाग्यवती बनने पर तब, मैं अंत समय इतराऊँगी
चूड़ियों की खन खन खन में, मैं फिर से लौटकर आऊँगी
जिस काँधे पे चढ़ आयी थी, उस काँधे पे ही जाऊँगी
धैर्य धरना तुम हे प्रिये, मैं फिर से लौटकर आऊँगी।

दीपक रखना, चंदन धरना, मटकी भी भर लेना तुम
अग्नि लपट में देह लिटाकर, फिर जी भर के रो लेना तुम
अपने सूने कमरे को मैं, यादों से जीवंत कराऊँगी
तस्वीरों की अमिट छवि में, मैं फिर से लौटकर आऊँगी
जिस काँधे पे चढ़ आयी थी, उस काँधे पे ही जाऊँगी
धैर्य धरना तुम हे प्रिये, मैं फिर से लौटकर आऊँगी।

पिता की पथराई आँखों में, तुम स्वप्न शेष दिखा देना
माँ के सूने आँचल में, ‘बालक’ को तुम लिटा देना
बाल हृदय के रुदन पर, मैं पीड़ा कैसे दिखाऊँगी?
उसकी निश्चल मुस्कान में, मैं फिर से लौटकर आऊँगी
जिस काँधे पे चढ़ आयी थी, उस काँधे पे ही जाऊँगी
धैर्य धरना तुम हे प्रिये, मैं फिर से लौटकर आऊँगी।

हार चढ़ेंगे, फूल चढ़ेंगे, औ जलेंगे धाम में दीपक
कसैली जिह्वा पर जब, सजेंगे मेरे नाम के रूपक
तब चिर में लीन अदृश्य सी मैं, मंद मंद मुस्कुराऊँगी
पुष्प पराग की गन्धों में, मैं फिर से लौटकर आऊँगी
जिस काँधे पे आयी थी, उस काँधे पे ही जाऊँगी
धैर्य धरना तुम हे प्रिये, मैं फिर से लौटकर आऊँगी।

तुम्हारी
हर्षिता