पिकासो के रंग पढ़ते हुए

‘Picasso Ke Rang Padhte Hue’, a poem by Upma Richa

मेरे हाथों में बहती है एक नदी
जाल डाले
मैं पकड़ता रहता हूँ
-दुःख, यातना में डूबा हुआ संसार
-उघड़ी हुई सच्चाइयाँ
-और खोये हुए-से चेहरे
मेरे हाथों को छूकर
बिखर जाती है
एक ठहरी हुई-सी लय
झक सफ़ेद कैनवास पर
मैं खोया रहता हूँ अक्सर
नीले आसमान
पीली धरती
लाल आँखों और
काले अँधेरों के बीच
मेरे आसपास
रंग बहुत है
मुझे बस
थोड़ा-सा पानी चाहिए
ज़िन्दगी को
ज़िन्दगी जैसा दिखाने के लिए…

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