1

इन घरों में घास क्यों उगी है
कौन रहता था यहाँ
काठ पर ताला किसकी इच्छा से लगाया है
इस आँगन को लीपने वाली स्त्री
और उसका आदमी
कहाँ गया

छाती से चिपकाकर नवजात शिशु को
या अंगुली पकड़कर
या कंधे पर बैठाकर
कैसे-कैसे गए होंगे

वे फूस की तरह सूखे हुए लोग
कहाँ उड़ गए
इन पेड़ों के नीचे बैठने वाला गाँव
कहाँ है
अरे, वो पेड़ कहाँ गए!

2

पैर आते हैं किवाड़ पास
दहलीज़ पर रखी चप्पल
किसका इंतज़ार करती है

लौटने की इच्छा से
किवाड़ को देखता हूँ
ये पैर किसकी बाँट में
रुके हुए हैं

घर से बाहर जाने पर
धूल का सा तन लिए
दो बच्चे
हवा में हाथ हिलाते हैं

वे इतना ही जानते हैं
हर शाम को पक्षी घर लौट आते हैं

काठ का मन लिए
चिर विछोह में डूबी आँखें
किवाड़ के पीछे से
टुक-टुक देख रही हैं

मौन का दुःख
शब्दों से ज़्यादा कारगर होता है।

अमर दलपुरा की कविता 'जीवन का दृश्य'

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