Poems: Anoop Kaahil

सुरंगों से गुज़रते हुए

एक सफ़र के दौरान रेलगाड़ी में खिड़की किनारे बैठकर
मैंने लगभग आठ बार अपनी आँखें बंद कर ली थीं

मैं नहीं चाहता था देखना
पटरी किनारे पड़ने वाली मलिन बस्तियाँ,
कीचड़ में लोट लगाते भद्दी नाक वाले सुअर,
ढीली इलास्टिक की मटमैली चड्डी पहने भागते हुए बच्चे,
पत्तों की जगह प्लास्टिक की गंदी थैलियों से लदे पेड़ कीकड़ के

मैं नहीं चाहता था देखना
काले पानी में टकटकी लगाये हुए सफ़ेद बगुले
कचरे के ढेर पर चबूतरा बनाये ताश खेलते लड़के
रेलगाड़ी के डिब्बों की गिनती लगाती हुई लड़कियाँ
और रेलगाड़ी के कम्पन से घर के दरवाज़े सम्भाले हुई औरतें

सो मैंने हर बार आँखें मींच ली थीं

सफ़र के बाद किसी के पूछने पर कि रास्ते में क्या-क्या देखा
मैंने बताया था लगभग आठ जगहों पर अँधेरी सुरंगों का होना।

एटलस

राह चलते हुए
मैं जब भी देखता हूँ किसी ऐसे व्यक्ति को
जिसकी गर्दन उसके शरीर की ऊँचाई कम करने की ज़िद में
आगे की ओर झुककर अकड़ गई हो
और जिसकी पीठ पर समस्त आकाश का भार
कूबड़ बनकर उभर आया हो
तब सोचने लगता हूँ कि
इन सारे कूबड़ वाले लोगों को मैंने अवश्य ही पहले कहीं देखा है
पर कहाँ यह याद नहीं आता
देखते-देखते उनके कूबड़ का आकार बढ़ने लगता है
जिसके विरुद्ध वो अपने पैरों से पूरा ज़ोर लगाकर
धरती में धँसने लगते हैं
और कुछ समय पश्चात वहीं पाषाणनुमा हो जाते हैं
फिर कुछ लोगों की भीड़ उन्हें घेर लेती है
और खींचने लगती है तस्वीरें
कई मूर्तिकार उन्हें अचरज से देखने लगते हैं
कई गणितज्ञ करने लगते हैं उन पर रखे भार की गणना
कई खगोलशास्त्री आकाश को बढ़ते हुए देख चिंतित हो उठते हैं
पर मेरे दिमाग़ में वही सवाल हलचल करता रहता है
कि इस कूबड़ वाले व्यक्ति को पहले कहाँ देखा है
और तब अचानक एक नाम याद आता है
ओह श्रापित एटलस!

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