अंशुल जोशी की कविताएँ

रफ़ू

बात उन दिनों की है
जब मुंडेरों पर बैठकर
ख़्वाबों के जहाज़ बनाकर
घर के आँगन में फेंका करते थे
लगता था दुनिया जेब में रखी है
जब जी चाहेगा ढेला भर निकालकर जेब से
ज़िन्दगी, छिटक देंगे खलाओं में
बचपन था तो ध्यान नहीं रहा
जेब फटी हुई थी
और ज़िन्दगी तिनका-तिनका गिरकर
जेब से निकल रही थी

आज जेब रफ़ू करवा दी हैं
पर रखने को कुछ भी नहीं!

पासपोर्ट

‘शेल्फ’ में कुछ काग़ज़ों के साथ
एक बूढ़ा ‘पासपोर्ट’ रहता था
ना ही कोई निशाँ, सियाही के, सफ़हों पर
ना ही किसी सफ़र का ज़िक्र लबों पर
उसके चेहरे की झुर्रियाँ
टूटी हुई उम्मीदों का आईना थीं
उसके ज़र्द पन्ने
उदासी की दास्ताँ सुनाते थे
‘एक्सपायर’ होने से पहले
बस इतना चाहता था वो ‘पासपोर्ट’
कि उसके बेटे उसे परदेस बुला लें।

निर्माण की प्रक्रिया

अगर हो पाता सम्भव
निर्माण की प्रक्रिया का क्रम पलट जाना
बनी बनाई इमारतें ढह जातीं
धरती फिर से हरी-भरी हो जाती
पेड़-पौधे जीवित हो उठते
नदियाँ नाचने गाने लगती
पर्वत के कंधे फिर उठ जाते
पंछी वापस घर आ जाते
फिर से हर जगह पानी-पानी होता

मैं एक बार
बिना मन को मारे
ढेर सारे पानी से नहाना चाहता हूँ

लोटे से थोड़ा पानी ख़ुद पर उड़ेलकर
मैं आज सोचता हूँ
अगर हो पाता सम्भव
निर्माण की प्रक्रिया का क्रम पलट जाना!

तुम्हारे जाने के बाद

तुम्हारे जाने के बाद
ये जिस्म एक इमारत बन चुका था
जिसमें क़ैद था
हमारा तुम्हारा इतिहास
तुम्हारे जाने के बाद
कई लोग आए
और
अपना नाम लिखकर चले गए
तुम्हारे जाने के बाद
फिर भी मुझे बस
एक तुम्हारे होने की वजह से जाना गया!

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