कवि, पुरुष और छली गई स्त्रियाँ

तुम्हारी देह के आगे कोई शब्द ही नहीं मिलता

मेरा पुरुष मेरे कवि की बाधा है
और मेरा कवि मेरे पुरुष की बाधा
हम दोनों एक-दूसरे को रोकते हुए आगे बढ़ रहे हैं
बढ़ते हुए लड़ रहे हैं
लड़ते हुए बढ़ रहे हैं

मेरे जीवन में जितनी भी स्त्रियाँ थीं
सबको छला मेरे पुरुष ने
कभी राम की मुद्रा में
कभी बुद्ध की तरह
कभी-कभी गांधी और मोदी की तरह भी

हर नायक के नेपथ्य में एक छली गई स्त्री होती है
स्त्रियों को छलकर ही बनते हैं नायक

मेरा कवि सभी छली गई स्त्रियों को तिनकों की तरह बीनता है
और घोंसला बनाकर चिड़िया की तरह रहता है
उनकी पीड़ा मेरे आकाश में बादलों की तरह बरसती है
और मैं भीग जाता हूँ कविताओं के द्रव से

हर कवि के आगे-आगे चलती है एक छली गई स्त्री
छली गई स्त्रियों के नेतृत्व में ही चलता है कवि

कविता दरअसल एक छली गई स्त्री है
जो भाषा के भीतर अपना एक गाँव बसाती है
और जो कोई भी उससे होकर गुज़रता है
उसके पाँव में अपने रक्त का आलता लगा देती है
इस तरह कविता से गुज़रने वाले मनुष्य को
कविता थोड़ा-सा स्त्री बना देती है!

प्रेमी, ईश्वर और कवि

लिखकर फाड़ी गई कविताओं में ढूँढना मुझे
मैं तुम्हें तुम्हारी स्मृतियों की गुफाओं में मिलूँगा
तुम्हारी साइकिल के गुच्छे से लटका हुआ
तुम्हारे रास्ते में पेड़ की तरह खड़ा हुआ

किसी कुम्हार की ज़रूरी नींद में जागता हुआ मैं
सो जाऊँगा एक दिन
तुम्हारे नाम लिखी किसी कविता में

ऐसे भी जिया जा सकता है जीवन
जैसे तुम्हारे बालों में सजता है गजरा
ऐसे भी मिला जा सकता है
जैसे मिलता है शरीर पंचतत्वों में
ऐसे भी बिछड़ा जा सकता है
जैसे बिछड़ती है आँसू की बूँद आँखों से
ऐसे भी याद रखा जा सकता है
जैसे याद रखते हैं हम अपना नाम
ऐसे भी भुलाया जा सकता है
जैसे भूल जाते हैं हम कि हमें मरना भी है

प्रेम के पाँव में चुभे हुए काँटों ने बनाया ईश्वर
और हृदय में धँसी हुई फाँस ने कवि
प्रेमी किस चीज़ से बनते हैं
ये ठीक-ठीक न ईश्वर जानता है
और न कवि…

अनुराग अनंत की कविता 'कविता की सलीब'

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अनुराग अनंत
अनुराग अनंत पत्रकारिता एवं जनसंचार में पीएचडी कर रहे हैं। रहने वाले इलाहाबाद के हैं और हालिया ठिकाना अंबेडकर विश्ववद्यालय लखनऊ है।

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