साथ रहना कितना आसान है

सबकी अपनी भाषा थी
पहाड़ों की अपनी
नदियों की अपनी
और हमारी अपनी अलग

मैं, पहाड़ और नदियाँ
फिर भी साथ-साथ रहे
सबसे सूखे दिनों को
उदासी की भाषा में पढ़ते हुए
और बूँदों की भाषा में
बारिशों में साथ भीगते हुए

बर्फ़ के दिनों में हमने
भाषाएँ नहीं बुनीं
सफ़ेद चादरें बुनीं
और बसन्त आने पर
हम मुस्कुरा दिए
फूलों की भाषा में

मैंने साथ रहते हुए जाना
कि भाषा बदले बग़ैर
साथ-साथ रहना
कितना आसान है!

घास

मैं वहाँ खड़ा हूँ—
जहाँ रास्ता ख़त्म होता है
और सड़क शुरू

हम सड़कों को
रास्ता नहीं कहते
रास्ते हमें घर ले जाते हैं
और सड़कें शहर

गाँव का हरिया
सड़क पर घास उगाना चाहता है
हरी-हरी घास
उसकी भेड़ों के हिस्से की
वो नरम घास
जिसे इंसानों ने चरा है।

हम बचाकर रखेंगे

मैं बचाकर रखूँगा
सर्द रात से थोड़ी-सी ठण्डक
गर्म दिनों के लिए
और स्याह रातों के लिए
तुम बचाकर रखना
जुगनुओं की रोशनी

मैं बचाकर रखूँगा
तुम्हारी मुस्कान
उदास दिनों के लिए
और कठोर पलों के लिए
तुम बचाकर रखना
अपना स्नेहिल स्पर्श

मैं बसन्त से कुछ रंग
उधार माँग लूँगा
तुम्हारे दामन के लिए
और तुम बचाकर रखना
उनकी ख़ुशबुओं को
पतझड़ के लिए

इस तरह हम
थोड़ी-सी गर्माहट
थोड़ी-सी ख़ुशबू
थोड़ी-सी रौशनी
और ढेर सारी मुस्कान के साथ
बचाकर रखेंगे
हमारी आँखों में
प्रेम की मौन अभिव्यक्तियाँ।

कोविड हेल्पडेस्क पर

(कोविड हेल्पडेस्क पर ड्यूटी के दौरान)

1

एक सोलह साल की लड़की
उम्र से पहले बड़ी होकर
मेरे सामने तनकर बैठती है
जिसकी आँखों का समंदर सूखकर
उदास रेगिस्तान हो गया है

उसको इस दूसरी लहर ने
अचानक बड़ा कर दिया
ज़िम्मेदारियों को अपने कांधे पर लादे हुए
काग़ज़ों का एक गुच्छा सम्भाले
वह मुझे उम्मीद से देखती है
और जल्दी-जल्दी आँखें मिचकाते हुए
भाई के सिर पर हाथ रखती है

मैं काग़ज़ पर कुछ लिखता हूँ
और उसे समझता हूँ—
आपको इस वाली स्कीम का ‘लाभ’ मिलेगा
फिर मैं ख़ामोश हो जाता हूँ
और देर तक सोचता हूँ
कि मेरा शब्दचयन कितना ग़लत है
कि सबकुछ खो देने के बाद
किसी को लाभ कैसे हो सकता है.?
मैं ख़ुद पर शर्मिंदा होते हुए
नये शब्द तलाशता हूँ।

2

पहले एक औरत आती है
फिर एक पुरुष आता है
मैं उन्हें सरकारी स्कीम समझाता हूँ

उनकी आँखों में धीरे-धीरे
उतरने लगता है पानी
गला थोड़ा-सा रुंध जाता है
वे गले को खँखारकर
ख़ुद को समेट कर बैठते हैं

मैं उनसे पूछता हूँ—
कोरोना की रिपोर्ट है क्या?
एक ख़ामोशी के साथ
उनके चेहरों पर उभर आती हैं
चिंता की कई-कई लकीरें

फिर मैं चुप हो जाता हूँ
और देर तक सोचता हूँ
कि एक काग़ज़ के टुकड़े का वज़न
मौत से इतना ज़्यादा क्यों है?

तुम्हारा यूँ आना

मेरी उदास रातों में
तुम उग आयी हो
किसी स्वप्न की तरह

तुम्हारा यूँ आना
इस सदी की भाषा में
सबसे बड़ी वर्जना है

मैं तुम्हें साथ लेकर
किसी आदिम सभ्यता की ओर
लौट जाना चाहता हूँ

जहाँ सारी भाषाएँ
सारी वर्जनाएँ
यहाँ तक कि ईश्वर भी
अभी गढ़े जाने के क्रम में है।

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अशोक कुमार
निवास: रोहिणी, दिल्लीवर्तमान में सरकारी स्कूल में गणित के अध्यापक के पद पर कार्यरत।बोधि प्रकाशन से एक कविता संग्रह 'मेरे पास तुम हो' प्रकाशित। इसके अलावा प्रेरणा अंशु, नवचेतना, युवा सृजन, कथाबिम्ब, छत्तीसगढ़ मित्र, और हंस आदि में कविताएँ प्रकाशित।ईमेल:[email protected]

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