एक यूँ ही मौत

जिन दिनों
मैं उलझ रहा था अपनी नींद से
जिन दिनों
मैं तोते की तरह रट रहा था ऐतिहासिक तथ्य
जिन दिनों
रातें बड़ी मुश्किल से कटती थीं
और सुबह का कोई ख़ास अर्थ नहीं रह गया था जीवन में
उन दिनों
तुम्हें याद कर
मैं टालता रहा सारी दुश्चिंताएँ

मुझे लगता रहा
एक दिन मेरी अनियमितताएँ ख़त्म हो जाएँगी
और मैं सकुशल लौट आऊँगा
अपने पूरे वजूद में

यह एक भ्रम था
जिसे टूटना ही था
और वह टूट गया

अब लगता है
एक अभिशप्त जीवन जी रहा हूँ
मुझे याद आती है
एक कहानी
जिसका नायक
तमाम सम्भावनाओं के बीच मारा गया
सम्भव है मैं भी मारा जाऊँ
अपनी शिनाख़्त में
एक यूँ ही मौत

जब मैं मारा जाऊँ
मुझ पर तरस खाना मेरे दोस्तो
मैं जीना चाहता था
अपनी जिजीविषाओं में पैबन्द लगाकर
मुझे मेरे अटूट यक़ीन ने ही मारा होगा।

बयान

काव्य पंक्तियों में
जितना बचा हूँ
उतना ही बचा हूँ जीवन में
मुझे मेरी कविताओं से बाहर न देखा जाए

देखा जाए तो
बस इतना कि
मैं अपनी पंक्तियों का भार लिए फिर रहा हूँ या
कि पंक्तियाँ ढो रही हैं मुझे

मुझसे मिलना हो तो
मेरे लिखे में ढूँढा जाए मुझे
पंक्तियों को लिए-लिए फिरा हूँ मैं सड़कों पर
मैंने जीवन को कविता की तरह जिया है

मैं जिससे भी मिला
मिला कविता की तरह
लोगों ने मुझे समझा तो मुझे तसल्ली हुई, कि
मनुष्य एक पंक्ति के सहारे खड़ा हो सकता है।

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गौरव भारती
जन्म- बेगूसराय, बिहार | शोधार्थी, भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली | इन्द्रप्रस्थ भारती, मुक्तांचल, कविता बिहान, वागर्थ, परिकथा, आजकल, नया ज्ञानोदय, सदानीरा,समहुत, विभोम स्वर, कथानक आदि पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित | ईमेल- [email protected] संपर्क- 9015326408

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