Poetry by Gaurav Bharti

क़ैद रूहें

उनका क्या
जो नहीं लौटते हैं घर
कभी-कभार
देह तो लौट भी जाती है
मगर रूहें खटती रहती हैं
मीलों में
खदानों में
बड़े-बड़े निर्माणाधीन मकानों में
इस उम्मीद में कि
उनका मालिक
लौटा देगा पूरी पगार
मुन्तज़िर आँखें
गालियाँ खाकर लौट जाती हैं काम पर

पल भर के लिए
बेबस आँखें टकराती हैं
बाट जोहती निगाहों से
मगर हथौड़े की चोट
उस पुल को ढहा देती है
जहाँ से मकां और घर के बीच का
सफ़र तय होना है

यहाँ सिर्फ़ ज़िस्म क़ैद नहीं हैं
रूहें भी क़ैद हैं
जो कभी-कभी दिख जाती हैं
ईटें जोड़ते हुए
रात के तीसरे पहर में

सुना है मालिक कोई जादूगर है
उसके पास कोई मन्त्र है
जिसके सहारे
वह क़ैद कर लेता है रूहों को

रूहें क़ैद हैं
खट रही हैं
खप रही हैं
नहीं लौटती हैं घर
महज़ आवाज़ें सफ़र करती हैं
निगाहें उसके पीछे चल देती हैं

एक घर है
जो बरखा को देख सर छुपाने लगता है
राह तकती निगाहें हैं
एक बूढ़ा बरगद है
जो ढहने वाला है
आम और अमरूद के छोटे-छोटे पौधे हैं
बेपरवाह परवरिश के शिकार
और एक इन्तज़ार है
पुल के इस तरफ़ भी
पुल के उस तरफ़ भी…

कोशिश

मुझे मालूम है
उछलकर चाँद को छूने की कोशिश
करता रहा हूँ मैं
मगर मुझे यक़ीन है
एक दिन मेरी उड़ान इतनी लम्बी होगी कि-
मैं उसका हाथ पकड़कर
उसे ज़मीं पर ला सकूँगा
मैं चाहता हूँ
चाँद के हज़ारों टुकड़े कर
लौटा दूँ रौशनी
उन असंख्य घरों को
जहाँ डिबिया की कालिख
लोगों के फेफड़ों में घर बना रही है

मेरी इच्छा है कि-
बाँस के खम्भों पर टाँग दूँ
चाँद का एक-एक टुकड़ा
बल्ब की तरह
ताकि दिख सकें गीदड़
जो मेमनों को आधी रात अपना शिकार बनाते हैं…

उतरते हुए

जब सर्द का मौसम
बयार के साथ
मेरी खिड़कियों पर थपकी देने लगता है,
ओस की स्याही से जब वह
काँच की खिड़कियों पर कुछ लिख जाता है,
मैं देखता हूँ उसे
पढ़ता हूँ हर्फ़-हर्फ़ उसका,
सूरज के उगने से पहले
हरी घास पर
अटकी हुई ओस की बूँदें,
यह अलसायी-सी सुबह
अंगड़ाई लेकर बार-बार उठना चाहती है
लेकिन फिर लिहाफ़ ओढ़कर सो जाती है

हथेलियों से चिपकाए
चाय से भरा कप
अब जब
चंद चुस्कियाँ जीभ पर तैरती हुई
गले में उतरती हैं
मैं भी उतरने लगता हूँ
सामने टँगी तुम्हारी तस्वीर में
हौले-हौले

यह तस्वीर भी सर्द की शाम की है
एक यादगार शाम
जिस दिन शायद मैंने
चाय की चुस्कियाँ भरनी सीखी थी
हवा में भी एक स्वाद होता है
महसूस किया था
शाम हमेशा बोझिल नहीं होती
जाना था
आँखें बहुत कुछ कह जाती हैं
देखा था
ख़ामोशी की अपनी ज़ुबान होती है
समझा था

मुझे याद है
तुम्हारी वह लम्बी बुनी हुई आसमानी स्वेटर
छुपी हुई हथेलियाँ
ताका-झाँकी करती
लम्बी उँगलियाँ
मैं लगा रहा होता गणित
स्वेटर की डिजाइन को लेकर
और तुम्हारी बड़ी-बड़ी आँखें मुझे ऐसे घूरती
मानो शाम शिकायत कर रही हो

मेरे अल्फ़ाज़ डरते हैं
आज भी डरते हैं ज़ुबाँ पर आने से
शायद इसीलिए लिखता हूँ मैं
मैं अब लिख सकता हूँ
बहुत सारे अफ़साने
जिसमें तुम्हें गढ़ सकता हूँ
अपने मन माफ़िक
लेकिन नहीं गढ़ता
क्योंकि मेरा गढ़ना
एकांकी लिखना होगा
जिसमें तुम अटोगे नहीं…

वे चाहते हैं

वे चाहते हैं
हम भेड़ हो जाएँ
जिसे वे जब चाहें हाँक दें

वे चाहते हैं
हम कुत्ते हो जाएँ
जीभ निकाले हुए
पूँछ हिलाते रहें बस

वे चाहते हैं
हम दुधारू गाय हो जाएँ
बिना लताड़ खाए
जिसे दूहा जा सके
साल-दर-साल

वे चाहते हैं
हम बन्दर हो जाएँ
जिसे वह मदारी ख़ूब नचाए

वह आया
हर बार आया
बार-बार आया
कुछ लुभावने सपने लेकर
दूर खड़े होकर उसने कहा
जो मन को भाए
बग़ैर हिचकिचाए
बिना शरमाए

इस बार उसने कहा-
‘आपकी जीभ आपके विकास में बाधक है’
थोड़ी देर सोचते हुए
फिर बोला-
‘यह देश के विकास में भी बाधक है’

अगली सुबह
मैंने देखा
क़िस्म-क़िस्म के जानवर कतारबद्ध
अपने विकास को लेकर चिन्तित थे
देश के विकास को लेकर व्याकुल थे…

टूटना

1

आवाज़ें
आती रहती हैं अक्सर
सामने वाले मकां से

टूटने की
फूटने की
चीख़ने की
रोने की
फिर सन्नाटा पसर जाता है
बत्तियाँ बुझ जाती हैं
और वह मकां
चाँद की दूधिया रौशनी में
किसी खण्डहर सा मालूम होता है
जिसकी बालकनी में थोड़ी देर बाद
एक पुरुष
सिगरेट के कश लेता हुआ
हवा में छल्ले बनाता है
जो अभी-अभी
अन्दर के कमरे से
एक युद्ध जीत कर आया है मगर
हारा हुआ नज़र आता है

2

आज भी टूटा है कुछ
लेकिन हमेशा की तरह बत्तियाँ बुझी नहीं हैं
कुछ और बत्तियाँ भक से जल उठी हैं

शोर बढ़ गया है उस तरफ़
एम्बुलेंस आकर रुकी है
वही पुरुष
जो अक्सर इस वक़्त बालकनी में दिखता था
दो जनों के सहारे
एम्बुलेंस में किसी तरह चढ़ता है

कहते हैं
टूटना अच्छी बात नहीं
लेकिन यक़ीं मानिए
आज जो टूटा है
वह सुकून भरा है
उसे बहुत पहले टूटना चाहिए था
ऐसी चीज़ें टूटनी ही चाहिए
कम से कम
मैं तो ऐसा ही मानता हूँ
आपको क्या लगता है?

ये वो शहर तो नहीं

जिसके लिए
छोड़कर आया था
पगडण्डियों की नरम घास
खेतों की हरी चादर
खुला आसमान

जिसके लिए
काटी थी कई लम्बी रातें
उम्मीदों की मोमबत्ती जलाकर

जिसके ख़्वाब पाले थे
ख़्वाबगाह में लेटकर

जिसके लिए
चुराए थे रूपए
गुज़ारी थीं शामें
जीभ को दबाए हुए

ये वो शहर तो नहीं
यक़ीनन नहीं
बिल्कुल नहीं

मालूम होता है
ठगा गया हूँ
छला गया हूँ
इश्तिहार से

लगता है जैसे
क़ैद हूँ कहीं
जहाँ मेरी चीख़
चारपहियों की पों… पों…
ले उड़ती है
लोगों की नज़रें
घूरती हैं
कभी-कभी ऐसे जैसे
कोई सज़ायाफ़्ता क़ैदी भागकर
उनके बीच आ पहुँचा हो…

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गौरव भारती
जन्म- बेगूसराय, बिहार | शोधार्थी, भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली | इन्द्रप्रस्थ भारती, मुक्तांचल, कविता बिहान, वागर्थ, परिकथा, आजकल, नया ज्ञानोदय, सदानीरा,समहुत, विभोम स्वर, कथानक आदि पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित | ईमेल- [email protected] संपर्क- 9015326408

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