शीर्षासन

देश, जो कि हमारा ही है
इन दिनों
शीर्षासन में है।
इसे सीधा देखना है तो
आपको उल्टा होना होगा।

माथे में बारूद घुमड़ता रहता अक्सर
आधे हाथ नीचे धंसे सोफ़े पर बैठा व्यक्ति,
नहीं समझ सकता यह सब।
एसी की ठण्डक में
उसकी आत्मा ठण्डी हो चुकी है।

यहाँ काँच को सावधानीपूर्वक छूना है,
मादाओं को नहीं।
मँहगे कालीन पर सम्भलकर पाँव रखना है,
बच्चियों के माथे पर नहीं।

यह सब देखते हुए
मेरी आँखें थक जाती तो मैं चश्मा लगा लेती
लिखते हुए हाथ दुखता तो बाम
और जब मन थकता
तब तुम्हारी तस्वीर देखती।

देश हमारा थक गया है
शीर्षासन के आसन में कोई कितनी देर रहा है भला।

मृत्युबोध

(युद्ध में बमबारी में मारे गए सीरिया के बच्चों के लिए)

जहाँ बर्तन और रिश्ते
दोनों नींबू से चमकाए जाते हों
जहाँ मानवता अब भी अनगढ़ है,
और प्रेम ढोंग।
वहाँ, आत्मा कैसे चमकायी जाती मुझे नहीं पता,
मेरे बच्चे

जब तुम नफ़रत, पीड़ा, मृत्यु शब्दों से
ठीक-ठीक परिचित भी न थे।
वहीं असहनीय पीड़ा संग मृत्युबोध!
कितना बर्बर आह!

एक शरीर में, एक और शरीर का अन्त होना-
एक मौत यह भी है, मेरे बच्चे
मैं कुछ-कुछ अनुमान लगा सकती हूँ
ठीक तुमसे कुछ ही कम पीड़ा लिए हुए।

तुम ईश्वर से किसकी शिकायत करोगे, मेरे बच्चे
जो इस ध्वँस के खेल में
पहले से मृत हैं यहाँ
उन मुर्दों की
या उन सड़ी आत्माओं की?
तुम्हारी वितृष्णा जायज़ है,
तुम्हारे रुदन से किसी का कलेजा नहीं फटना यहाँ
बम फोड़ने वाले
कलेजा का फटना नहीं समझते।
यहाँ मौत का जश्न मनता है, विलाप नहीं।

तुम अपनी चमकती आत्मा
किस ईश्वर के हाथ सौंपोगे, मेरे बच्चे!
जिनके पास हाथ ही नहीं।
क्या ईश्वर को नहीं पता
हाथ तो बच्चों को गोद लेने उठते हैं
हाथ तो बच्चों को स्नेह देने उठते हैं
बच्चों की आत्मा मरोड़ने के लिए कहाँ!

साँप

आधुनिक-सभ्य होने के क्रम में
साँप
नगर में आ बसा है।
हड्डियाँ भी टूट चुकी है रीढ़ की,
कब की। उसे याद भी नहीं।

चीटियाँ घिसट ले जा रहीं उसे, जीवित ही।
लहूलुहान साँप आधुनिक बन चुका है
फन काढ़े

कुचला रीढ़विहीन साँप
सभ्यता के मुहाने पर है अब।

जद्दोजहद

जद्दोजहद
जो हमेशा है,
रोटी, कपड़ा और मकान के लिए
बिकनी, पिज़्ज़ा और जहान के लिए
तो कहीं
जूठन, फ़ुटपाथ और श्मशान के लिए।

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