आने वाला दृश्य

आदमी, पेड़ और कव्वे—
यह हमारी सदी का एक पुराना दृश्य रहा है
इसमें जो कुछ छूट गया है
मसलन पुरानी इमारतें, खण्डहरनुमा बुर्जियाँ और
किसी के इंतज़ार में झाँकती टूटी हुई कोई मेहराब
शायद अब उन पर उल्लुओं और चमगादड़ों का क़ब्ज़ा हो गया है

हाँ, तो इस दृश्य में
कव्वों ने आदमी के साथ मिलकर
पेड़ काटने की साजिश की,
पेड़ लगातार कट रहे हैं और आसमान
हमसे दूर… बहुत दूर होता जा रहा है

अब कव्वों ने इंसानों के साथ रहना सीख लिया है
अब आदमी कव्वों से घिर गया है
घर में कव्वे, दफ़्तरों में कव्वे
सड़कों पर कव्वे, पार्क की बेंच पर—
जिधर देखो कव्वे ही कव्वे

कैसा लगेगा जब दुनिया का कारोबार
और कुछ लोगों का बाज़ार बन्द हो जाएगा
और चले जाएँगे सब लोग
मुझे यक़ीन है तब भी कव्वे वहाँ दिखायी देंगे

अब पेड़ के बाद
दृश्य से आदमी भी ग़ायब हो गया है
आने वाला दृश्य सिर्फ़ और सिर्फ़ कव्वों का है
आदमी और पेड़ के बिना कव्वों का होना कैसा लगेगा

दोस्तों! पेड़ ज़रूर कट चुके हैं
लेकिन हारे नहीं हैं
वे नीचे गिरते भी हैं तो एक गरिमा के साथ
लेकिन अफ़सोस आदमी…

लुटियन टीला

संसद की भाषा
आजकल खादी की भाषा बोलती है
वहाँ की हर कंकड़ी
अपने को
कमल-पत्र पर गिरी ओस की बूँद समझती है

तैंतीस गाँव के उजड़े हुए टीले पर
क़ब्ज़ा करके
वो समझते हैं कि
हिन्दुस्तान की सरज़मीन के चारों तरफ़
ब्रह्माण्ड में उनकी तूती बोलती है
और…
और ख़ाकी रंग की जमाअत को गुमान है
कि वो देश के अन्तिम नागरिक को
इस ऊँचे टीले से वरदान बाँटती है।

लखौरी ईंटों से झाँकते

मेरे बचपन की धूप में
ढह गए बुर्ज की
भुरभुराती लखौरी ईंटों से झाँकते
मेरे दादा हैं
परछाइयों में ढूँढते
ऊँघते हुए बैठे
पिता की शिकस्ता आवाज़
तैर आती है मुझ तक
लौ के उदास सन्नाटे में
फ़ाक़ों से भरे दिन हैं
घर-कुनबे के बुज़ुर्ग और सुबकते हुए बच्चे
बहू-बेटियाँ, माँ और दादी की सूनी आँखों में
लहकते हुए पुरखों के सपने हैं,
तुम्हें कुछ पता है
ग़ुरबत में यह भी ग़रीबी से लड़ने की अदा है!

लड़कियों का अपना कोई घर

लड़कियों का अपना कोई घर नहीं होता
लड़कियाँ इस घर से उस घर जाती हैं
लड़कियाँ अपने पिता के घर से
लड़के वालों के घर जाती हैं
ज़्यादा-से-ज़्यादा अपने पति के घर जाती हैं
चाहो तो उसे ससुराल कह लो
‘नाहक लाए गवनवा’ जैसी बातों का दर्द
अब समझ में आ रहा है
कि लड़कियाँ बचपन ही से घर क्यों बनाती हैं
और, अकेले बन्द कमरों में भी घर-घर क्यों खेलती हैं
और एक दिन
इसी खेल-खेल में वे अपने घर की नहीं
पराये घर की जीनत बनकर रह जाती हैं

इस घर से उस घर तक पहुँचने में ज़िंदगी
खेत-क्यार,
न्यार-सानी,
चूल्हा-चौका, टूक-पानी
और शामें धूएँ की अनकही कहानी बनकर रह जाती हैं

बचपन का यही खेल
उम्र की आख़िरी साँस तक चलता है
कभी-कभी यह कहने को जी होता है
‘क्या लड़कियाँ भविष्य द्रष्टा होती हैं…!’

राजा बोला

राजा बोला—
‘रात है’
मंत्री बोला— ‘रात है’
एक-एक कर फिर सभासदों की बारी आयी
उबासी किसी ने, किसी ने ली अंगड़ाई
इसने, उसने— देखा-देखी फिर सबने बोला—
‘रात है…’
यह सुबह-सुबह की बात है…

बुत में ख़ुदा बोलेगा

रात भर की ख़ुमार-आलूद
तेरी पुरनूर आवाज़ का लम्स
आसमानों का तवाफ़ कर
जब ओस की बूँद बनकर मुझ पर झरा
तो चुप की एक नादीद-सी लकीर खिंचती चली गयी
रूह के शफ़्फ़ाफ़ काग़ज़ पर

होटों की कश्तियों पर दूर…
बदन की लहरों से लिपटी हुई आ रही है
ज़िन्दा जादू की तरह मौजे-गुल मेरी सिम्त
कि जिस जा से गुज़रता हूँ
आवाज़ के मुहीब नक्श
बर्क़ की तरह रौशन होकर
सुब्ह के तारे में तब्दील होते जाते हैं
और यूँ लगता है कि आज फिर
किसी बुत में ख़ुदा बोलेगा…

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