बचाकर रखे हैं कुछ रंग

बचाकर रखा है
होठों का गुलाबी रंग
उन वैधव्यता वाले गालों के लिए
जिनके पति लिपटे हुए लौटते हैं तिरंगे में

बचाकर रखा है
बालों का काला रंग
उस खिलखिलाती मुस्कान के लिए
जो सहमी हुई है किसी अनजान साये से

बचाकर रखा है
नखों का श्वेत रंग
उस वर्तमान के सौहार्द के लिए
जो धूमिल हो गया है इतिहास की कालिख से

बचाकर रखा है
अपने रज का लाल रंग
उन गर्भगृहों के लिए
जिनके गर्भ में टिकने नहीं दिए जाते
गर्भधारिणी के पैर

बचाकर रखा है
अपनी आँखों का नीला रंग
उन गहरे समन्दरों के लिए
जिनके बेकल मौन ने चखा है प्रेम में नमक

बचाकर रखा है
मैंने कविताओं का रंग
उन बची-खुची सम्वेदनाओं में
जहाँ भविष्य की सम्भावनाएँ साँस ले सकें।

चींटियों के पंख

चींटियों की लम्बी क़तारें नहीं,
भिनभिनाती मक्खियाँ
उड़ा ले जाती हैं
मीठे का स्वाद

क्षमता से अधिक भार उठाने वाला
समाजवादी व्यवस्था का
सबसे अधिक शोषित वर्ग है

हो सकता है
मात्र कर्मठता पर ऐसी उदारवादी परिभाषाएँ
स्थापित करें
तुम्हें एक समृद्ध लेखक के तौर पर,
पर याद रखना
ये उदारवादी नीतियाँ ही
रीढ़ तोड़ने का माद्दा रखती है।

इसलिए चींटियों के भी पंख निकलने आवश्यक हैं
मक्खियों के मानिंद,
ताकि ‘कर्मठता’ में ‘कुशलता’ के हाथ लग सकें।

पंखों की मज़बूती

मेरे पिछले प्रयास इतने असफल भी नहीं थे
कि मेरे स्वप्न मेरी आँखों से ओझल हो सकें

मेरी आँख से गिरी हर बूँद ने चखी थी
मेरी देह से गिरती स्वेद कणों की बूँदें

उन दोनों का मिलना इस बात का संकेत था
कि अब क्षितिज के पार पंख पसारने आवश्यक हैं

पँखों की मज़बूती की परिभाषाएँ
तभी परिमापित हो गई थीं,
जब मैंने लाँघी थीं वह रेखाएँ
जो काजल से बनायी गई थीं

इन्हें लाँघते हुए
कितने ही लाँछनों ने
मेरे माथे को चूमा
पर मेरे माथे से गिरती
हर एक बूँद सक्षम हो गई है
मेरे चरित्र पर लगे
बेहिसाब दाग़ों के दाग़
हटाने में…

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