लड़कियों का मन कसैला हो गया है

इन दिनों
लड़कियों का मन कसैला हो गया है

अब वह हँसती नहीं
दुपट्टा भी लहराती नहीं
अब झूला झूलती नहीं
न ही गाती है कोई गीत
खेत की पगडंडियों पर सखियों से कुलांचे भरती नहीं
वह आकाश की तरफ़ भी नहीं देखती
न ही चाँद को देर रात निहारती है
आईने के सामने घंटों सजने वाली
अब आईना भी रोता है

वह पाँच कपड़ों के भीतर रहकर भी नंग-धड़ंग महसूसती है
अब भाई-पिता की नज़रों से भी डरती है
वह नोंच देना चाहती है अपनी मुलायम चमड़ी को
काट देना चाहती है रेशमी बाल
भोथोड़ देना चाहती है होठों को
धू-धू कर जला देना चाहती है अपना अस्तित्व
उसे धिक्कार है स्वयं के होने का
वह खो रही है धैर्य
वह धकेल रही है ख़ुद को लिजलिजे गड्ढे में
वह निरन्तर कीच में धँस रही है

अब धरती बंजर होने को है
जहाँ लड़कियाँ देह से इतर कुछ भी नहीं
वह धरती बाँझ है
वहाँ देवता नहीं
दैत्य बसते हैं

काठ की कुर्सी पर बैठे सत्ताधारी को काठ मार चुका है; वह सूँघता है जाति
देखता है धर्म
गिनता है वोट
लगाकर आग फूलों को
सेंकता है रोटी

दहक रहा है देश
दहक रहा समाज
अब थर्राने की बारी तुम्हारी है।

बारिश

बारिश की बूँदें
जब गाँव-घर से होते हुए
खेत-खलिहान, ताल-तलैया, मड़ैया पर पड़ती हैं
तब वातावरण में एक गीत गुंजायमान होता है

सूखे होंठ
गुनगुना उठते हैं
मन हिलोर लेने लगता है
दुख-दर्द, बीमारी-तबाही भूल
किसान बिचड़े संग खेत की ओर दौड़ लगाता है

औरतें अंदर का तापो-तमस भूलकर
तरुणी की भाँति ढिठाई से
घुटनों तक साड़ी खोंसे कीचड़ में अठखेलियाँ करती हैं

बच्चे भूख-प्यास किताब की निचली तह में दबाकर
पसली को तगड़ी-सी चिकोटी काटकर
पगडंडियों पर दौड़कर फिसलने की रेस लगाते हैं

बूढ़ी दादियाँ आँचल के कोर से लोर पोंछकर
आँखों को ज़मीन में धँसाकर
चूल्हे पर अदहन बैठातीं
खेसारी दाल चुनतीं
पटुवा साग खोटती हैं

बूढ़े बाबा शांति से चीख़कर
मचान पर बैठे-बैठे ही चौकस हैं
बीड़ी पी-पीकर धुएँ उड़ाते हुए
गिद्ध नज़र से अंदाज़ा लगाते हैं—
इस बार धान उन्नत होगी
या पत्ते की पीली धारियाँ धान को
असमय ही निगल लेंगी।

बाढ़

फुलवा ख़ुश है
सरकारी अरवा चावल मिला है
सड़क किनारे तम्बू के बग़ल में
ईंट के चूल्हे पर भात डबक रहा है
तीनों बच्चे चूल्हे के गिर्द
भात का डबकना देख तृप्त हो रहे हैं
फुलवा के सीने में दूध उतर आया है
भात की गंध मात्र से ही दवाग्नि
शांति पा रही है

हाँफता हुआ हरखू आता है
फुलवा से कहता है—
रे फुलवा! हमार घर पूरा डूब गेल रे
अब कोउनो उम्मीद नाही…

फुलवा
भावशून्य तिरछी निगाह से देखती है
कहती है—
यह तमाशा हर साल का है
ढाढ़स रखो
सरकारी लोग चावल-पन्नी दे गए हैं
कुछ दिन ढूह पर ही ठौर होगा

बरकुआ देग से भात पसार रहा
केले का पत्ता झुलस गया है।

सुरेश जिनागल की कविताएँ

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ज्योति रीता
गाँव में रहने वाली एक आम स्त्री हूँ।Email- [email protected]

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