स्त्री

प्रेम नापने का अगर मापदंड
होता तो स्त्री उसकी इकाई होती

टूटी रातें और बिखरे हुए दिन
को समेटने का जिम्मा, स्त्री के
हिस्से आया

अगल-बग़ल बिखरी इच्छाओं को
अचक से चूल्हे की अग्नि में होम
करती रही स्त्री निरन्तर

वृक्षों से झड़ने के बाद पोखर में
तैरती हैं उसकी मृत कामनाएँ

और जलसमाधि लेते स्त्री के प्रति
जीवन मूल्यों के पिंड उसके अस्तित्व
पर प्रश्न चिह्न हैं!

मलिनशय्या

कुंज गली में एक अँधेरे मकान के
सीलन भरे कमरे में वमन और मूत्र
की तीखी दुर्गंध आ रही

मिट्टी के तेल से बने लुक्के की लौ
दीवार से उखड़े हुए चूने की अजीब
डरावनी आकृति ने अपनी जगह
बना ली

मलिनशय्या पर जर्जर स्त्री देह
उसने हाथ पर गुदवा रखा था
पति का नाम, अपनी अंतिम
यात्रा की प्रतिक्षा में

सिरहाने रखा एक फफूँदी
लगा कुंजा, उसके पीछे
झाँकती राधाकृष्ण की तस्वीर,
साथ रखा एक गोपीचंदन

मुड़ी की पोठली, चार बूँदी के लड्डू
तम्बाकू की डब्बी तकीये के नीचे ऐसे
छुपा ली जैसे साथ लेकर जाएगी
‘राससखी’!

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ज्योति शर्मा
ज्योति शर्मा का जन्म वृन्दावन के एक रूढ़िवादी महंत परिवार में हुआ। भीमराव आम्बेडकर यूनिवर्सिटी आगरा से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर। ब्रजक्षेत्र के विषय पर उनके लगातार गम्भीर कार्यों के लिए ब्रज संस्कृति शोध संस्थान द्वारा उन्हें ब्रज संस्कृति सम्मान प्रदान किया गया। ज्योति आकाशवाणी से समय-समय पर काव्य पाठ और कथापाठ करती रही हैं। उनकी कविताओं की पहली पुस्तक 'नेपथ्य की नायिका' बोधि प्रकाशन से अतिशीघ्र प्रकाशित हो रही है। ये कविताएँ स्त्री जीवन और विशेष रूप से भारतीय सामान्य स्त्री के जीवन से उठायी गयी हैं। यह कविताएँ स्त्रियों के जीवन और मन पर ईमानदार टिप्पणी हैं। बचपन से वृन्दावन की विधवा स्त्रियों के आसपास रहने से उनके साथ एक गहरा जुड़ाव और अनुभव रहा है। उनसे सुनी हुई उन्हीं के जीवन की यर्थाथवादी कहानियों का संग्रह भी जल्दी ही प्रकाशित होगा।

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