Poems: Kamalesh Tewari

पीड़ा

पेड़ जब उखड़ता है तेज अंधड़ में
गिर जाता धरती पर
अस्थमा के बलगम भरी छाती-सा हाँफता
लेता गहरी-गहरी साँस
आख़िरी साँस के इंतज़ार में।
किसी अदृश्य जड़ की बाल से भी बारीक कली
रह जाती जुड़ी धरती से
ठेठ गहरे पाताल में।
वो अदृश्य जड़ जो करती महसूस
ख़ुद से बहुत दूर पड़े पेड़ का दुःख
पर दिखती नहीं किसी को
कहती नहीं कुछ भी
दुःख में बनती चिर सहभागिनी
वो… पीड़ा है।

जिज्ञासा

बच्चा जब घुटनों पर चलता है
सरकता, किलकता, मचलता रहता है
अचानक ठहरकर घुमाता है गर्दन
लक्ष्य करता किसी चीज़ को
अपलक ताकता रहता है।
वो चाहे ख़ुद की परछाई हो
बूढ़ी दादी या मैं-मैं करती बकरी
या कोई टूटा हुआ खिलौना।
अपलक ताकते बच्चे की आँख
हो जाती फैलकर अण्डाकार,
पुतलियाँ बदल जातीं एक प्रश्नवाचक चिह्न में
वहीं से शुरू होता सफ़र
जिज्ञासा के ‘जि’ का।

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