1

जीना किसी सड़ी लाश को खाने जैसा
हो गया है,
हर एक साँस के साथ
निगलता हूँ उलझी हुई अंतड़ियाँ,
इंद्रियों से चिपटा हुआ अपराधबोध
घिसटता है
माँस के लोथड़े बिखरने तक,
हड्डियाँ अकड़ गयी हैं
इच्छाओं के सिकुड़ने से,
उल्टियाँ उमड़ती हैं
जब आता है कोई सामने,
बोटी-बोटी
मैं किसका निवाला बन रहा?
एकदम से क्यों नहीं
सुड़कता कोई?
कब तक सपने देखूँ
मोर बनने के
कीड़े की तरह सुरसुराते हुए,
मनुष्य होने की शर्मिंदगी
मुझे कुम्हला देगी।

2

खेजड़ी के खोखे खाता हूँ
तो याद आता है बचपन में उनको चुगना,
खिचयों की सुगंध से
नींद में सपना बुनता हूँ उनके तले जाने का
और कल्डड~ड की आवाज़ से जाग जाता हूँ,
सोचता हूँ, नया कुछ नहीं
केवल पुनरावृति,
पसीने की बू ले जाती है
‘ठेंका लकड़ी’ के पेड़ पर,
उछलती बॉल गिरती है
दूर मेरे ‘खुच्चा दड़ी’ के पाले में,
नीम का मिमझर
शिशु की तरह महकता है
और किसी जलती चिता की स्मृति
में ढकेल देता है…

3

सस्ते सुखों के लिए
ओढ़ लेता हूँ सस्ता-सा डर,
कई बार रटा है सार्त्र का ‘बेड फेथ’
पर हमेशा किसी दिवास्वप्न
द्वारा मारा जाता हूँ,
कोई न कोई धागा खोजता हूँ
उड़ने के लिए, पंख होते हुए भी,
कहानियों में गुँथा हुआ आत्म,
अनात्म की कल्पना
में बेहोश होना चाहता है

4

सुरंग में चाँद
अटका पड़ा है, बुझा हुआ
मेरा दम घुट रहा है
घिसटते-घिसटते,
कोई तितली आए
तो बाहर निकलूँ!

5

रमा चित्र बना रही है
मेरा उसके चित्र बनाने पर लिखते हुए का,
मैंने लिखा—
तुम्हारा हरा रंग
मेरे नीले में घुलना चाहता है,
तुम्हारा स्पर्श पाकर
कैनवास से उड़ना चाहता हूँ,
तुम्हें चूमकर गुलाबी होना
कबूतर बन जाना है…
रमा कूची से बिखेर देती है
पीला और बैंगनी,
मेरा चेहरा टटोलकर गहरे विषाद से बोलती है
‘लाल भी उदास हो सकता है।
मैं किसी की सरस्वती नहीं हो सकती।’

6

चलते-चलते मैं एक पेड़ हो गया
पिघला दिया मैंने आत्म को
बहा दी दुःखों की गठरी,
नदी की तरह पवित्र हो गया
मैं चलते-चलते,
मैंने ख़ुद को बाहर निकलते देखा शरीर
के खोल से
नदी को समुन्द्र में गिरते देखा,
लहरों के खेल को देखा
गले में अटके पड़े जीवन को निगलते देखा
मैंने चलते-चलते!

7

गूँगे हो गए हम
परिपक्व बनने के नाटक में
बहुत कुछ खो गया
थोड़े-थोड़े शब्दों में,
शराब पीते हुए भावनाओं को जला दिया आख़िर
हम दया के पात्र है
किसकी कृपा होगी और
खिल उठेंगे हम,
अंकुर बनकर रहना बहुत पीड़ादायक है अब…

8

मैं आगे ठहर गया हूँ
समय के इंतज़ार में,
समय सिकुड़ने की जल्दी में
निकल जाएगा आगे,
समय ख़त्म हो जाएगा
मुझे चबाते-चबाते,
मेरा पेट नहीं भरता अँधेरे से..

9

जब ईश्वर को खोजते
मैं पहुँचा उसके पास
उसने अपना साफा मुझे पहनाया
एक बीड़ी फूँकी मेरे साथ और
कूद गया समुन्द्र में..

10

विरोधाभासों में उलझी पड़ी है भाषा
प्रकाश भी परावर्तित होकर आता है
अंधेरा ही तो नहीं कहीं यह?
सुगंधों की बेहोशी!
ध्वनि ठहरती नहीं कभी,
और तुम पूूछते हो कि चेतना कहाँ है?

जिम जारमुश् की फिल्म ‘पैटर्सन’ में रॉन पैजेट की कविताएँ

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