Poems: Manjula Bist

1

पीड़ा ही याद रही…

जिनमें भी सौन्दर्य था
वे नश्वर सिद्ध थे
पीड़ाओं में कभी सौन्दर्यबोध न था
सो वे अमर हैं!

इसीलिये ही तो
सारी तितलियों के भी जीवाश्म बेरंग पाए गए हैं
और उनके पँखों से ज़्यादा याद रह जाते हैं
शाखों पर लटके हुए उनके कसमसाते कोकून!

2

पराग-पथ

जीवन उतना ही होता है
जितना जीया जाता है
वह सम्पूर्ण व निश्चित है

जीवन लीलने हेतु
मृत्यु कभी भटकती नहीं है

आख़िर
भटकती तितली को ही तो
अपने पराग-पथ का पता मालूम था न!

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मंजुला बिष्ट
बीए. बीएड. गृहणी, स्वतंत्र-लेखन कविता, कहानी व आलेख-लेखन में रुचि उदयपुर (राजस्थान) में निवास इनकी रचनाएँ हंस, अहा! जिंदगी, विश्वगाथा, पर्तों की पड़ताल, माही व स्वर्णवाणी पत्रिका, दैनिक-भास्कर, राजस्थान-पत्रिका, सुबह-सबेरे, प्रभात-ख़बर समाचार-पत्र व हस्ताक्षर, वेब-दुनिया वेब पत्रिका व हिंदीनामा पेज़, बिजूका ब्लॉग में भी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं।