मनमीत सोनी की कविताएँ – II

Poems: Manmeet Soni

कविता

एक मछली
मरी किनारे
और
बर्फ़ हो गया सागर..!

प्यास

यूँ ही नहीं होते
रेगिस्तान में
इतने ऊँचे धोरे

हमने यहाँ
सदियों
बूरी है
अपनी प्यास..!

स्कूलिंग

पानी में
तैर रही लाश को
यह बच्चा
नाव क्यूँ समझ रहा है?

पतंगें

पतंगें सोचती हैं
उन्हें मिलवाया जा रहा है-

पतंगें नहीं जानतीं
उन्हें लड़वाया जा रहा है..!

तुम्हें फूल देने से पहले

तुम्हें फूल देने से पहले
उस फूल को
कई बार परखा मैंने

क्योंकि उस फूल को
न तुमसे कमतर होना चाहिए था
और न तुमसे बेहतर होना चाहिए था..!

दूध-सा कुछ

जब भी
किसी दुधमुँहे को
खिलाया है गोद में

पुरुष होते हुए भी
छाती में
उतर आया है दूध-सा कुछ..!

ताजमहल

शाहजहाँ के पास
चिकना काग़ज़ था
सोने की क़लम थी
लिखने के लिए
वक़्त भी ख़ूब था

लेकिन शाहजहाँ के पास
एक भी कविता नहीं थी..!

बहुत अजीब है तुम्हारा शहर

जहाँ पहले फ़्लोर पर रहने वाले आदमी की नींद
चौथे फ़्लोर पर रोते हुए बच्चे की आवाज़ से खुल जाती है
लेकिन पहले फ़्लोर पर रहने वाले उसी आदमी की नींद
दूसरे फ़्लोर पर चीख़ रही लड़की की आवाज़ से नहीं टूटती-

बहुत अजीब है तुम्हारा शहर!

नम्बर

एक सार्वजनिक पेशाबघर की दीवार पर
कोयले से लिखा था- ‘आई लव यू पूजा’
और ब्रेकेट में लिखा था दस डिजिट का मोबाइल नम्बर

कितनी उम्मीद
कितनी वहशत
कितनी ख़ुराफ़ात
एक ही जगह सिमट आयी थी

ख़ैर मैं नहीं जानता
वह पूजा का नम्बर था या उस आशिक़ का
लेकिन अगर वह पूजा का नम्बर था
तो वहाँ प्यार तो क़तई नहीं था…

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