सार्वजनिक मकान

बेतरतीब घर को सहेजने-सँवारने में
स्त्री लगाती रोज़ अपना बेशक़ीमती वक़्त
सजा-सँवरा घर कितना निखर आता
वर्षा के बाद खुले आसमान की तरह
मिलता सुकून उसे अपना कहने का
उन्हें सिर्फ़ बिगाड़ना आता
बिगाड़ते रहते
रात होते-होते दिखती
विशृंखलता फिर से चारों ओर
रिश्तों को भी सहेजती रही वह यूँ ही
अकेले अपने कंधे पर
जिस दिन स्त्री ने सोचा
इस बेतरतीबी को वह नहीं सहेजेगी
यह ज़िम्मा सिर्फ़ उसका नहीं
उस दिन टूटे घर के कितने सामान
चीख़ों से घायल हुआ कान
शरीर पर उग आयीं लकीरें
फिर न रही रिश्तों में जान
घर, घर न रहा
बन गया सार्वजनिक मकान।

पथराई आँखें

हृदय की कोमलता
बड़ी ख़तरनाक होती है
सही-ग़लत का फ़र्क़ मिटा देती
बुद्धि जिसे ग़लत करार देती
हृदय उसे भी सही ठहरा सकता
माफ़ कर देता दूसरों की बड़ी से बड़ी ग़लती
खा लेता धोखा एक बार फिर
जिससे छला जाता रहा बार-बार
बन जाती स्त्री की दयार्द्रता ही
उसकी सबसे बड़ी दुश्मन
उसकी आँखें ही आर्द्र नहीं रहतीं
हृदय भी आर्द्र होता
स्त्रियाँ सतायी जातीं सिर्फ़ इसलिए
कि वे कठोर होना नहीं जानतीं
अगर अपनी प्रकृति के ख़िलाफ़ जाकर
कठोर होने का विकल्प चुन भी लें
तो ख़ुद से ही कितना लड़ना पड़ता
यह अपने आँसुओं को
ज़बरदस्ती छुपाने में समर्थ
स्त्री की पथराई आँखों से पूछो।

हाथ उठाते पुरुष

स्त्रियों पर हाथ उठाते हुए पुरुष
होते घुन लगे बाँस की भाँति
लम्बे तनकर खड़े
पर अंदर से पोपले दुर्बल अस्थिविहिन
स्त्रियों को समझते घड़े में रखा पानी
जब चाहो ग्लास में डालो, गटागट पी लो
ना चाहो तो उंडेल दो बाहर
उनके हुकूमत की बेऊदूली
बदल देती उन्हें
लम्बे नाख़ूनों और बालों से युक्त
हिंसक ख़ूँख़ार पशु में
टूट पड़ते स्त्री पर
बनाने उसे अपना निवाला
उनके लिए घर होता एक साम्राज्य
और वे उसके अधिपति
अगर कोई विरोध का स्वर उठाए
तो माना जाएगा इसे देशद्रोह
फिर लगाया जाएगा इल्ज़ाम चरित्रहीनता का
कोई है जो उसे भड़का रहा
वरना कहाँ यह निरीह बेबस लाचार
और कहाँ यह क्रांतिकारी तेवर और मिज़ाज
फिर शुरू होती क़वायद
उसे पूरी दुनिया के सामने नंगा करने की
मुकर्रर की जाएँगी कई सज़ाएँ
शक्तिशालियों के ख़िलाफ़ बोलने वालों की
होती सदैव यही गति
पर क्या आततायियों के भय से
क्रांतियाँ नहीं होती
या सज़ा के भय से
याद दिलाना छोड़ दिया जाता
कि अधिपति होने का हक़ होता सिर्फ़ उसे
जो पोषण करता है, शोषण नहीं।

अनलिखी कविताएँ

कुछ प्रेम कविताएँ मैंने कभी नहीं लिखीं
क्योंकि जिसको मैं सुनाना चाहती थी
वह सुनने को कभी राज़ी न हुआ
किसी और को सुनाने की इच्छा न हुई
ज़ेहन में पड़े-पड़े उन पर अब धूल जमने लगी है
सोचा है उन अनलिखी तहरीरों को अब लिख ही डालूँ
फिर उन्हें एक नदी में बहा दूँ
जैसे-जैसे उसकी स्याही पानी में घुलती जाएगी
मुझे चैन पड़ता जाएगा
सुना है नदी सागर से मिलती है
क्या पता कभी इस भव-सागर से
उस भाव-सागर का मिलन हो ही जाए।

अहम् ब्रह्मास्मि

हर क्षण, हर पल हृदय के पास
जब एक और हृदय धड़कता
तो हो जाती हूँ मैं पंखों से भी हल्की
कस्तूरी मृग की भाँति मेरे अस्तित्व से
एक स्वर्गीय ख़ुशबू निकलती रहती
डूबी रहती उसमें सराबोर
शरीर में एक तितली फड़फड़ाती
होता एहसास ख़ुद का
एक कमल नाभ में बदल जाने सा
कभी वह अपने पाँव फैलाता, कभी हाथ
शरीर उस तनाव को झेलता
पर मन सीमाओं को तोड़
फैल जाता अनंत दिशाओं में
मेरे अंदर एक सृष्टि रची जा रही
मेरे शरीर का कण-कण गढ़ रहा उसे
होता एहसास एक सर्जक होने का
मेरे द्वारा धरती पर लाया जाएगा वह
झेलूँगी मैं प्रसव पीड़ा
पर माँ बनने का गौरव
यूँ ही तो नहीं मिलता
वह मेरी रचना होगी
मैं रचनाकार
मुझे लगता है इस सृष्टि को भी
रचा होगा ज़रूर किसी स्त्री ने
इस पुरुष प्रधान समाज ने
ब्रह्मा की कल्पना कर
कर लिया उसे अपने नाम
यह एक आदि-छल था
धोखे में रखे गए हम सब आज तक
घोषणा करती हूँ मैं आज
इस धरती पर जो भी नवीन आया
लाया गया स्त्रियों के द्वारा
हम ही हैं जननी इस ब्रह्माण्ड की।

मुकुल अमलास की अन्य कविताएँ

Recommended Book: