Poems: Nandita Rajshree

तुम्हारा ना होना

अब जबकि तुम नहीं हो, कहीं नहीं हो
ना पीछे छूटी है कोई वजह इंतज़ार की
फिर भी जैसे उग आए हैं मुझमें ढेरों कान
सुन पा रही हूँ हवाओं की आहटें
जिनमें तुम्हारा न होना बज रहा है
शायद साँकल की कोई खटक तुम्हारी हो
पर इस पसरे हुए सन्नाटे का प्रलाप-भर है
देहरी की धूल में नहीं हैं तुम्हारे क़दमों के निशान
एक ख़ालीपन-सा उगने लगा है गमलों में
मैं शायद खाद-पानी से पोसने लगी हूँ

धूप अब भी चटकीली-चमकीली है
रातें भी चाँद-सितारों से सजकर आती हैं
मगर इन शामों का रंग फटा-फटा-सा है
पता नहीं मेरी आँखों में बादलों ने डेरा डाल दिया है
या फिर ये चाय के गर्म प्याले से उठती भाप है
सच है कि समय पीछे नहीं लौटा करता फिर भी
ये तय तो नहीं था कि रास्ते यहीं रुक जाएँ
आसान है चले जाना, छूट जाना बहुत मुश्किल।

ये रंग लाल

लगाया करो ना..
गहरी लाल लिपस्टिक अपने होंठों पर
और लम्बी उँगलियों पर नेल पेंट.. वो भी लाल
देखो ना.. सूरज भी डूबते हुए हो जाता है लाल
अच्छा लगता है लाल.. गहरा गाढ़ा रक्त-सा

कुछ घाव.. पीठ पर भी लगते हैं
देर लगेगी देखोगी जब तुम
रक्त कुछ गाढ़ा हो चलेगा…
तुम्हारी नेल पेंट से कुछ ही ज़्यादा
कुछ नया नहीं लगेगा

ये कुछ अलग वक़्त है
समझा करो.. लाल रंग की आदत डालो
वैसे भी खारे पानी से घाव जलेगा
और तुम्हारी लाल नाक
सर्दियों में ही अच्छी लगती है

कोशिश करो.. सच में.. एक बार
आदत हो जाए फिर
लाल तुम्हें डराएगा नहीं

अच्छा तो फिर तय रहा ना कि..
तुम बात मानोगी मेरी!

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