Poems: Neelam Samnani

त्रिभुजाकार

उन लम्हों तक शिकायत
करने का हक़ है
जिन घड़ियों तक तुम
किसी के होते हो

फिर तो वक़्त
भी त्रिभुजाकार की तरह
भिन्न कोणों पर ठहरा रहता है
थोड़ा पास और थोड़ा दूर

अजनबियों से थोड़ी दूरी ज़रूरी है!

चाह

मैं प्रेम पड़ी वो
पागल औरत हूँ
जिसे धरती भी चाहिए
और आसमाँ का टुकड़ा भी

पर तुम्हारा प्यार
चाहिए मुझे
मेरी साड़ी के
पल्लू में पड़ी
मन्नत की एक गाँठ जितना

एकदम छोटी गाँठ, जो
हज़ार मन्नतों
का हाथ थामकर, मुरादों
की एक सुरीली कविता
बना देती है!

ध्वनि

अक्सर ख़ामोश होने पर
ध्वनि धीमी पड़ने लगती है
कई खराश करके भी
आवाज सध नहीं पाती
फिर
लुढ़ककर गिरती है
जैसे काँच का कोई गोल बर्तन
बिना आधार ‌के होने पर
छन से गिर जाता है

या
बिल्कुल ऐसे जैसे बरसों पुराना जंग लगा
कोई ताला जिसमें कई बूँद
तेल डालने पर भी
टस से मस नहीं होता

तब आवाज़ें अपना
दम घोंटकर आत्महत्या
कर लेती हैं
और
उनके मरते ही देह
सिर्फ़ हाथ पैरों से घसीटकर
चलने वाला यंत्र
रह जाता है!

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