चूमना, प्रेम में हूँ, नाराज़गी

Poems: Paritosh Kumar Piyush

चूमना

(एक)

उसे चूमते हुए
मैंने जाना

सचमुच
इस ग्रह पर
होठों से बेहतरीन जगह
कहीं और नहीं होती…

(दो)

साल दो हज़ार सोलह के अगस्त की
वह कोई अलसायी-सी शाम रही होगी
जब उसने पहली बार
मुझे चूमा था

ठीक उसी सन्नाटे के साथ
मैंने जाना था कि
प्रेम में चूमना, शायद
दुनिया का
सबसे सुखद एहसास है

मैं ग़लत था, वक़्त ने बताया मुझे-
आँखों का तिलिस्म, होठों की राजनीति
प्रेम का अभिनय, शरीर की भूख
ख़ामोशी के पीछे का बाज़ार
और शाम की साज़िश…

प्रेम में हूँ

मैं अपने ख़ानदान, अपनी बिरादरी में
अब तक का
सबसे बदनाम आदमी हूँ

मैंने बेहद संगीन अपराध किया है
हर तरफ़ मेरे अपने
मेरी हत्या के लिए दिन-रात
मुझे ढूँढ रहे हैं

उन्हें ख़बर लग गयी है
मैं किसी स्त्री के
प्रेम में हूँ…

नाराज़गी

मैंने पूछा-
नाराज़ हो?
उसने थोड़ा पीछे हटकर
आँखों की पुतलियाँ गिरा लीं

मैंने उसकी दायीं हथेली को
अपनी हथेली में भरकर
चूमते हुए कहा, तुम
दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत स्त्री हो…

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