परवीन साकेत उपन्यास ‘उर्मिला’ और कविता संग्रह ‘ए टिंज ऑफ़ टर्मरिक’ की लेखिका हैं। परवीन ‘द बॉम्बे लिटरेरी मैगज़ीन’ में पोएट्री एडिटर हैं और ‘एनुअल दम-पुख़्त राइटर्स’ वर्कशॉप की सह-संस्थापक भी हैं।

अनुवाद: किंशुक गुप्ता

देवी गढ़ने हेतु मूर्तिकार के लिए गाइड

हो सकती हैं उसकी दो बाजुएँ या छः या दस भी
पर सिर्फ़ एक जोड़ी पैर जिनके बीच
कुछ नहीं
कपड़े की एक मुलायम तह के अलावा।
वो पकड़ सकती है गुलाब, भाला,
शंख, तलवार, त्रिशूल
या असुर का क़लम किया हुआ सिर
पर कभी नहीं मॉश्चराइज़र की बोतल,
कपकेक, पेंचकस,
या कोई माइक्रोफ़ोन।

उसकी कलाई मुड़ी होनी चाहिए
शालीनता से, अलौकिक नृत्य
की किसी मुद्रा में स्थिर
पर अगर वो निर्थरक लगे
तो तुम चुनना चार में से एक मुद्रा
और कर लेना स्वर्ग की ओर
अपना मार्ग प्रशस्त।

हँसने दो उसे या दिखने दो उदासीन
सौम्यता से भरी, या अनंत में घूरने दो
जब तक उसकी नज़रें न भेद दें
असुर का अस्तित्व;
पर वो कभी नहीं दिखनी चाहिए
शराब का गिलास पकड़े जश्न मनाती हुई
या दौड़ाती हुई शेयर मार्केट पर नज़रें
या अपने पैर पर निकल आए गोखरुओं पर
करती हुई कोई ट्वीट
(वो इसी स्थान पर तीन सौ वर्षों
से जड़वत् खड़ी है)।

उसके बाल चाहे कसकर बंधे हों
या लहरा रहे हों कंधों पर
और चाहे जीवन में वो भी गुज़री है
इन्हीं बारिश से भीगे रास्तों पर
याद रखो तुम्हें भूल जाना है
बालों के घुँघराले या सफ़ेद होने के सभी चिह्न।

उभरे स्तन होने चाहिए सी-कप
या, डी-कप—अपनी वासनाओं
को कला में जीना—
पर कभी स्तनपान कराते हुए नहीं
या ढलके हुए दूध या गुरुत्वाकर्षण से
पहनाओ उसे नौ गज़ रेशम
नाभि में सही तरह से खोंसी हुई
और चाहे वो हम सबकी माता है,
वो नहीं पहन सकती
कोई भी स्ट्रेचमार्क।

ख़ून, अगर दिखाना ही है
होना चाहिए सिर्फ़ हाथ या चेहरे पर,
युद्ध, शौर्य या पुरुषत्व का गौरवान्वित लाल
बर्दाश्त की जा सकती है टपकती एक-आध बूँद
उसके असुर को चबाते मुँह से
पर उसे ज़रूरत नहीं पड़ सकती
सैनिटरी पैड
या गर्म पानी की बोतल की
और अगर रक्त-स्राव हुआ भी
तो उस हफ़्ते के लिए
वो छोड़ देगी
मंदिर का परिसर।

औरत बनने की कला पर मिली चयनित सलाह

घुटने जोड़कर बैठो। आसूँ बेकार करने की बजाय प्याज़ को दस मिनट के लिए पानी में भिगा दो। देवी, तुम मंदिर हो—तुमने कैसे उसे अपना शरीर छूने दिया। बच्चे पैदा करो। लड़के पैदा करो। बस में भीड़ होने पर एक खुला पिन अपनी छाती से सटाकर रखो। मुँह बंद करके हँसो। इतिहास में भुला दिए गए लोग भी अंततः अपनी जड़ें पा लेते हैं। ऊँची, अपनी टाँगें ऊँची उठाओ, तुम बेलेरिना हो, कोई मूतने वाला कुत्ता नहीं। निर्मोही प्रेमियों को समझने के लिए बिल्लियाँ पालो। नफ़रत करने वाली स्त्रियाँ प्रेम जताने वाली स्त्रियों से अधिक रोचक होती हैं। गलियों में जॉगिंग की ज़िद क्यों करनी, इसके या उसके लिए अपना अंग-अंग क्यों हिलाना—ट्रेडमिल किसलिए हैं? पति के परिवार की मत सुनो (सिवाय जब वो सही हों)। अगर किसी मित्र से सड़क पर मिलना बहुत ज़रूरी हो, उसका पहले बस स्टॉप पर इंतज़ार करो ताकि ऐसा न लगे तुम निमंत्रण दे रही हो। सुबह दोबारा आएगी। रात दोबारा आएगी। ये लो, ऑर्गेनिक बेसन, एलो वेरा, हल्दी, समझी, पहले शहद के साथ मिलाओ, समझी, नहाने के पंद्रह मिनट पहले लगाओ, समझी, तुम्हें रसगुल्ला बनना है, गुलाबजामुन नहीं। तुम्हारा संशय भी उनके सच से विश्वसनीय है। वो कहेंगे नाचो ऐसे कि कोई देख नहीं रहा, पर याद रखना कोई न कोई हमेशा देख रहा होता है। जब विधि में बटर लिखा हो, ऑलिव-ऑयल का प्रयोग मत करो। साड़ियाँ पहनो। कभी ऐसे आदमी से शादी मत करो जिसे बाद में तलाक़ देने का तुम्हारा मन न करे। भड़कीली लिपस्टिक लगाओ। एक फूल की भी जड़ें खाद में दबी रहती हैं। लॉन्जरी पहनो। कोई कमीज़ बिल्कुल नापसंद हो तो उसे ऊनी कपड़ों के साथ धोने में डाल दो। न्यूड मेकअप करो। तुम्हारी आवाज़ दुनिया की सबसे तेज़ धार है, किसी को यह हक़ मत दो कि वह तुम्हें बताए कि वह तुर्श है। हील्स पहनो। एक सुबह उस बूढ़े आदमी को अपने बिस्तर पर देखकर तुम्हें सच्चे प्यार पर विश्वास करने की अपनी मूर्खता पर अफ़सोस होगा, पर मैं वादा करती हूँ, यह सब बीत जाएगा। चलो। स्नीकर्स पहनो। अपने जन्मदिन मनाओ, ख़ासकर चौथे दशक वाली। बेटी पैदा करो, चलो सिर्फ़ एक, बुढ़ापे के लिए। दो, दो, दो, जब तक खोखली न हो जाओ। ख़ून बहाओ। वो कहेंगे यह औरतों का वक़्त है, पर तुम तब तक न मानना, जब तक वो यह कहना बंद न कर दें।

बंदरगाह और दाख़िले

व्यग्रता से भरी, सोलह की मैं
कॉलेज फ़ॉर्म की लम्बी क़तार में इंतज़ार करती
वयस्कता के सभी चिह्न मेरे शरीर पर

क़रीने से सजे हुए, जब पीछे वाली लड़की
पूछती है: पारसी? और मैं एक उदासीन हँसी
हँसकर रह जाती हूँ, पर शायद

मेरे जबड़े का झुकाव ही उसके लिए काफ़ी है
एक और टापू का अन्वेषण करने हेतु
हम किशोरियों की सर्पीली क़तार में।

प्रीलिम्स में मेरी स्टडी पार्टनर
भी पारसी थी: वह बताती है।
फिर जोड़ देती है: वैसे, लज़ीज़ खाना।

शुक्रिया, मैं मूर्खता से, कहती हूँ
जैसे मैंने ही लिखी है सभी पारसी विधियाँ
उसके चिकन धनसाख और अन्य व्यंजनों के लिए।

यह अधिक सुहावना दिन है उसे बताने के लिए
कि मैं एक परजात से, उसकी मुलायम,
दुरूह त्वचा से प्रेम करने लगी हूँ

और मुझे उससे शादी करने के लिए
अपनी ही माँ की अंत्येष्टि से
बाहर कर दिया जाएगा, उस किंवदंती की तरह

सोफ़ी आँटी के बारे में, जिन्हें रुकना पड़ा था बाहर,
ड्राइवरों और सहकर्मियों के साथ
जो कभी नहीं रहे उनकी

पारसी माँ के मृत पारसी गर्भ में।
बाद में उन्होंने रिरियाते हुए बताया
आवारा बिल्ली को भी जाने दिया गया

शव के पीछे। और फिर कौए,
केंचुए और बिना जीभ के सभी जीव।
फिर वो थककर ख़ुद ही चुप हो गईं।

आज हम हज़ार वर्ष देर हो गए हैं, ध्वस्त नाव
से उतरे, भाषा न जानने वाले शरणार्थियों
द्वारा किए हड़बड़ाए वायदों को बदल पाने के लिए,

शायद चार हज़ार वर्ष देर यह पूछने के लिए
कि पिता का ख़ून ही क्यों निर्णायक होता है,
और शायद दो दशक शीघ्र हैं, जब मैं

अपने बच्चे को घुटनों पर झुलाती, पढ़कर सुनाऊँगी:
इसी तरह जिस कली को जड़ों की बजाय
पंखों की चाहत थी, वह तितली बन गई

और जड़ों वाले सभी प्राणियों ने हाथ लहरा
उसका अभिवादन किया, जब पंखों के साथ वह
उड़ चली थी

एक खुले, खुले आकाश की ओर!

कमला दास की कविता 'परिचय'

किताब सुझाव:

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किंशुक गुप्ता
किंशुक गुप्ता मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के साथ-साथ लेखन से कई वर्षों से जुड़े हुए हैं। अंग्रेज़ी की अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओंं में कविताएँ, लेख और कहानियाँ प्रकाशित। कविताओं के लिए अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित। 'मिथिला रिव्यू', 'जैगरी लिट', 'उसावा लिटरेरी रिव्यू' के संपादक मंडल के सदस्य।

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