क़स्बे का कवि

वह कोई अधिकारी नहीं है कि लोग
जी सर, हाँ सर कहते हुए काँपें उसके सामने
नेता नहीं है कि इंसानों का समूह
पालतू कुत्तों के झुण्ड में बदल जाए उसे देखते ही
ब्याज पर धन देकर
ज़िन्दगी नहीं बख़्श सकता वह लोगों को
कि लोगों के हाथ गिड़गिड़ाते हुए मुड़ें
वह तो एक छोटा-सा कवि है इस क़स्बे का
रहता है बस स्टॉप की कुर्सियों
बिजली के खम्भे-सा
टीन का बोर्ड अजनबियों को
पते बताता हुआ
अपने होने को क़स्बे से साझा करते हुए
सुबह-शाम सड़क किनारे के पेड़ों-सा दिखता
साइकिल पर दौड़ता प्लम्बर
ठहर जाता है उसे देखकर
अरे यार नहीं आ सका
नल की टोंटी ठीक करने
दरअसल क्या है न
कि मोटे कामों से ही फ़ुर्सत नहीं मिलती
पर आऊँगा किसी रोज़
अभी किसी तरह काम चला
प्रेमी जोड़े जिन्होंने कविताएँ पढ़ी हैं उसकी
देखा है उसे डाकघर की तरफ़ आते-जाते
साल में एकाध जोड़े उनमें से
उसकी कविताओं की खिड़की से कूदकर
सुरक्षित निकल जाते हैं क़स्बे से।
बिछुड़ने के बाद।

याद

जिन्हें माँ की याद नहीं आती
उन्हें माँ की जगह किसकी याद आती है?
जिन्हें बहन की याद नहीं आती
उन्हें बहन की जगह किसकी याद आती है?
याद नहीं आती जिन अभागों को अपने बाबा की
उन्हें बाबा की जगह किसकी याद आती है?

बाज़ार
हिंसा
सताने वाली व्यवस्था
याद ही को नष्ट कर दे
अभी मैं मानने को तैयार नहीं इसे

यही है वजह
मैं पूछता हूँ सबसे सब जगह
जिन्हें अपने गाँव की याद नहीं आती
उन्हें गाँव की जगह किसकी याद आती है?

कोई भी चीज़ लम्बी नहीं चलती

कोई भी चीज़ इतनी लम्बी नहीं चलती
न ख़ामोशी लम्बी चलती है
न आँसुओं की झड़ी
न अट्टहास
न हँसी
न उम्मीद, न बेबसी

ग़रीबी को लम्बा चलाने की साज़िश
रची जाती है दिन-रात
मगर समृद्ध करते रहते हैं लोग अपना जीवन
और-और तरीक़ों से
पूँजी के बिना भी जीते हैं लोग
गाते हुए गीत और लोरियाँ।

अपनोंं में नहीं रह पाने का गीत

उन्होंने मुझे इतना सताया
कि मैं उनकी दुनिया से रेंगता हुआ आया
मैंने उनके बीच लौटने की ग़रज़ से
बार-बार मुड़कर देखा
मगर उन्होंने मुझे एक बार भी नहीं बुलाया

ऐसे अलग हुआ मैं अपनों से
ऐसा हुआ मैं पराया

समुदायों की तरह टूटता-बिखरता गया
मेरे सपनों का पिटारा

अकेलेपन की दुनिया में रहना ही पड़ा तो रहूँगा
मगर ऐसे नहीं जैसे बेचारा

क्योंकि मेरी समस्त यादें सतायी हुई नही हैं

सुंदर काण्ड

लोग धर्म के नाम पर चंदा माँगने आते हैं
हमारे चंदे से एक चाक़ू ख़रीदा जाता है
ईदगाह कॉलोनी का नाम बदलकर
जनकपुरी रख दिया जाता है
एक इलाक़े में इसकी ख़ामोश प्रतिक्रिया होती है
शाम में शहर में धारा एक सौ चवालीस लगती है

शहर के पुराने सिनेमा वाली गली में
फ़िरोज़ को युवावाहिनी के एक सदस्य द्वारा
चाक़ू मार दिए जाने की ख़बर आती है
फ़िरोज़ को अस्पताल में ख़ून की ज़रूरत पड़ती है
लोग पहचान लिए जाने के कारण से ख़ून देने नहीं जा पाते हैं
दो-तीन घण्टे बाद फ़िरोज़ के
नहीं रहने की ख़बर आती है

दो-तीन महीने बाद
लोग फिर सुंदर काण्ड के नाम पर चंदा माँगने आते हैं
हम फिर सुंदर काण्ड के लिए चंदा देते हैं…

पीला फूल चाँद

“मैं उस गाय की तरह हो गया हूँ
जिसने बछड़े को जन्म दिया है
या कह लो उस सूअरी की तरह
जिसने पूरे बारह बच्चे जने
और अब उनकी सुरक्षा में डुकरती है

आज मैं एक सूम काले पडरेट को जन चुकी
भैंस के पेट की तरह हल्का हो गया हूँ
या कह लो उस भेड़ की तरह ख़ुश
जिसने जन्मा है काली मुंडी और सफ़ेद शरीर वाले मेमने को

आज ऐसा हुआ है
जिससे मिला है आत्मा को सुकून

कल की रात का चाँद
अभी तक लग रहा है छाती पर गिर रहे
सुलगते कोयले की तरह
पर आज की रात
आत्मा पर झर चुका है
पीले फूल की तरह चाँद!”

बंजारा नमक लाया

साँभर झील से भराया भैंरु मारवाड़ी ने।
बंजारा नमक लाया ऊँटगाड़ी में।

बर्फ़ जैसी चमक
चाँद जैसी बनक
चाँदी जैसी ठनक
अजी देसी नमक
देखो ऊँटगाड़ी में
बंजारा नमक लाया ऊँटगाड़ी में ।

कोई रोटी करती भागी
कोई दाल चढ़ाती आयी
कोई लीप रही थी आँगन
बोली हाथ धोकर आयी
लायी नाज थाळी में।
बंजारा नमक लाया ऊँटगाड़ी में ।

थोड़ा घर की ख़ातिर लूँगी
थोड़ा बेटी को भेजूँगी
महीने-भर से नमक नहीं था
जिनका लिया उधारी दूँगी
लेन-देन की मची है धूम
घर गुवाड़ी में
बंजारा नमक लाया ऊँटगाड़ी में।

कब हाट जाना होता
कब खुला हाथ होता
जानबूझकर नमक
जब ना भूल आना होता
फीके दिनों में नमक डाला मारवाड़ी ने।
बंजारा नमक लाया ऊँटगाड़ी में।

(साभार: विजय राही व ‘अथाई’)

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प्रभात
जन्म- १० जुलाई 1972. कविताएँ व कहानियाँ देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। २०१० में सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार और भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार और २०१२ में युवा कविता समय सम्मान। साहित्य अकादमी से कविता संग्रह 'अपनों में नहीं रह पाने का गीत' प्रकाशित।

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