Poems: Preeti Karn

इश्क़-ए-अमृता

मैं चखती हूँ
इश्क़ की चाशनी
बिना किसी परहेज या
बंदिशों की दख़ल के बग़ैर

मुझे इश्क़ हो जाता है
सुबह की चाय जब खौलती है
अदरक की सौंधी सुखन में।

मैं कई बार ख़ुद को खो देती हूँ
बेकिंग ट्रे से उठती हल्की-हल्की
भीनी
वनिला एसेंस की
मादक अनुभूति में।

मुझे गुरेज़ नहीं उन
हवाओं से
जो हौले-से पलकों को
चूम लेती हैं।
इश्क़ का मुमकिन है
मुक्कमल होना…
मेरी नज़र में।

ध्येय

परिदृश्य पल-भर के
ठहराव की अनुमति लेकर
उपस्थित होते हैं
नदी की सतह पर!
मैं सहजता से
प्रतिबिम्बित छवि को
निहारती हूँ अपलक।

मेरा ध्येय
उसे भित्ति चित्रों में
परिवर्तित करना मात्र है
किंतु स्पर्श का कम्पन
तहस-नहस कर देता है,
एक-एक कर बिखरती
टूटती तरंगों को
तट से निहारती हैं आँखें।

मैं सहेजती हूँ
अपने प्रतिबिम्बित
सहस्र भग्न चेहरे।
अंजुरी-भर जल से
आचमन की
अभिप्सा अनर्थ भी
रच जाती है।

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प्रीति कर्ण
कविताएँ नहीं लिखती कलात्मकता से जीवन में रचे बसे रंग उकेर लेती हूं भाव तूलिका से। कुछ प्रकृति के मोहपाश की अभिव्यंजनाएं।

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