प्रीती कर्ण की कविताएँ

Poems: Preeti Karn

श्वेतवर्णी

श्वेतवर्णी पुष्प सदैव प्रिय थे
थलकमल पारिजात से लेकर
मोगरे जूही की मुखर अभिव्यंजना का
आत्मबोध
संचित सुखों का अभिवर्धन हैं।

निर्जन को शोभायमान करते
कास के फूलों का आलोड़ित स्वरूप
मोहबंध हैं।

सूखते मन की तरलता है
मोगरे के
श्वेत पुष्पों का सुवासित प्रलोभन।

मैं कुमुदिनी के आभा से व्यग्र
दलदल में धंसा देती हूँ
अपने पाँव
उसकी स्पर्शानुभूति
दुःखों का विस्मरण है….

निशा का सद्य स्नात मुख
धवल ज्योत्सना से दीप्त
उन्मुक्त विचरती पीड़ा का
अंकुश है…

मैं बिसूरती हूँ सारे अभिप्राय
अनायास दर्पण मुझे सहेजी हुई सारी
शुभ्रता केशराशियों में लौटा रहा है…
ख़ुशियों के रंग और मायने
दोनों ही बदल दिये हैं…
मैंने
अपनी अन्यमनस्कता से!

प्रतीक्षा

हथेलियों की अनगिनत
बनती बिगड़ती
बारीक आड़ी तिरछी और
वक्र रेखाओं के मध्य
नियत स्थान पर स्थित
आजन्म खड़ी
अक्खड़ सी सीधी लकीर,
तुम्हारी प्रतीक्षा का प्रतिबिम्ब
स्वरूप
उगते डूबते सूरज की
किरणों से सरोकार नहीं रखती
अन्यमनस्क सी
अंधेरे उजाले का विभेद मिटाकर
निजता की पृष्ठभूमि
का आधार लेकर
अविचल।
अधीर मन की
वाचालता का
निरंतर प्रतिघात
सहकर भी
जिसने चलना बदलना नहीं सीखा।
क्षणिक सुख दुःख के
व्यतिक्रम का व्यामोह
अव्याप्त।
निढाल हो जाते हैं
स्वतः ही अवरोध
एक अरसे की
अवहेलना सहकर।
प्रतीक्षा सम्भाले रहती है
स्वयं को अनवरत।

ध्येय

परिदृश्य पल भर के
ठहराव की अनुमति लेकर
उपस्थित होते हैं
नदी की सतह पर!
मैं सहजता से
प्रतिबिम्बित छवि को
निहारती हूँ अपलक।

मेरा ध्येय
उसे भित्ति चित्रों में
परिवर्तित करना मात्र है
किन्तु स्पर्श का कम्पन
तहस नहस कर देता है
एक एक कर बिखरती
टूटती तरंगों को
तट से निहारती हैं आँखें।

मैं सहेजती हूँ
अपने प्रतिबिम्बित
सहस्र भग्न चेहरे।
अंजुरी भर जल से
आचमन की
अभिप्सा अनर्थ भी
रच जाती है!

दृष्टिकोण

समवेत स्वर का रुदन
और समेकित प्रार्थनाएँ
सुन रहे हो नील मेघ!
द्रवित होगा मन
कभी!
पसीजेगी अंतरात्मा…
तुम्हारी।
जीव जलचर तरु व्यथित
पीत ज्वर की
वेदना से
ओढ़ लो अब
श्यामवर्णी बादलों के खोलकर पट
बूंदें झिलमिल
तिलमिलाई पीठ पर
संगीत लिख दें
सहजता से धरा के
नाम बस प्रीत लिख दें।

प्रीति
किरदार सब एक एक कर
मरते जा रहे हैं
सम्मुख खड़े शाश्वत सत्य की
अवहेलना और
गुज़रते जा रहे विस्मृत अवशेषों का
गौरव गान
यही तो करते हैं
हम तुम और हमसब
सब कुछ पीछे छोड़कर
भूल जाते हैं
ये वो वृक्ष हैं
जिस पर दोबारा
बसंत की सम्भावनाएँ
अपेक्षित नहीं होती
इनकी अस्थियाँ भी
गंगा में बहा दी जाती हैं।

दृष्टिकोण

दृष्टिकोण और दायरे
दोनों ही बदले हैं मैंने
जिनके लिए बदलाव की
सीमाएँ तय हैं
धुँधले होने की अवस्था में
कोण बदलती हूँ
दूरियों को मिटाने में
माप लेती हूँ
चंद क़दमों के अथक प्रयास
अँधेरों से संघर्ष करने में
जलाती हूँ अनगिन दीप
हवाएँ झकझोरती हैं जब
अपनी ही पीठ की
ढाल से बचा लेती हूँ
थरथराती लौ…
मैं हर प्रयास से
जीतकर संघर्ष
हार गई हूँ
तुम्हारे दृष्टिकोण से!