तीन कविताएँ

हद

एक नदी को आज
कठघडे में खड़ा
किया गया है
कभी स्वच्छ धवल
उज्ज्वल हुआ करती थी
पवित्रता की प्रतिमूर्ति
आज गंदी नाली में
तब्दील हो गई है
उस पर इल्ज़ाम है
अपनी हदें तोड़ने का
हदें तोड़कर
सैकड़ों जान-माल
अपने साथ बहा ले जाने का
उन्हें कोई नहीं पूछता
जो नदी की हदों को
साल-दर-साल
कम से कमतर करते रहे
बेचारी नदी का
इसमें क्या कसूर
अपराध तो उसके साथ हुआ है
कोई आपके घर घुस आए
अपना घर बना ले
और आप उफ़्फ़ ना करें
अदालत तो उसे जाना था
नाइंसाफी की ये हद है!

नदी को गुस्सा क्यों आता है

पहाड़ों के बीच से
एक नदी कल-कल करती
काजल की रेखा सरीखी
पतली दुबली क्षीणकाय
जब मैदान में उतरती है
तो अचानक घिर जाती है
उसके चीर हरण को तैयार
एक नहीं करोड़ों कौरवों के बीच
उसके त्राहि माम सुनने को
अब कोई कृष्ण भी नहीं है
कौरवों के सभागार में
उसे जब करनी है
स्वयं अपनी सुरक्षा
इतने सारे ख़ून के प्यासों से
तो वो वही करती है
आत्म रक्षा का एक मात्र गुर
जो उसे ईश्वर ने सिखाया है
आँसुओं की बाढ़ में वो
बहा ले जाती है सब कुछ
अपने रास्ते में आते हुए
पेड़ पौधे घर बार और चौक चौराहे
प्रलय लाने में कोई कसर नहीं छोड़ती
वो करे भी तो क्या
आत्म रक्षा का अधिकार सभी को है
और आप पूछते है
नदी को गुस्सा क्यों आता है?

बदला

दूसरों के द्वारा तय
मर्यादाओं का पालन करना,
दो किनारों के बीच
निःशब्द निरन्तर बहते रहना,
नदी की यही नियति है,
इसी नदी के ऊपर जब
अन्याय का बोझ भारी होता है
नदी की देह घायल होती है
दर्द से फूल जाती है
तो उसके सब्र का बाँध टूट जाता है
नतीजा प्रलय से कम नहीं होता
मर्यादाओं का पालन हो
नदी अपने किनारों के बीच ही बहे
इसकी ज़िम्मेदारी
सिर्फ़ नदी ही की नहीं
हम सब की भी है
हम उसके सब्र का इम्तेहान
लेते ही क्यों हैं
जितने कचरे को
वो बहा ले जा सकती है
उससे सौ गुना अधिक
उस पर क्यों लादते हैं
फिर जब वो प्रतिकार करती है
सारे बंधन तोड़ चल पड़ती है
अपना नया रास्ता ढूँढ लेती है
तो उसे नए सिरे से बाँधने की
क़वायद करने लगते हैं हम
जब तक हम नहीं सुधरेंगे
नदी बदला लेती रहेगी बार बार
हर बार और अधिक हिंसक
और अधिक क्रुद्ध होकर
दुनिया की सबसे आदिम
इच्छाओं में से एक
बदले की इच्छा है…

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