नियम

पिंजरे में बन्द मैना
घर की औरतों से
गाती-बतियाती
फुदकती
उड़ते पंछियों को देख
पंख फड़फड़ाती
खा लेती, जो मिल जाता।

आग नज़रों के नीचे
रौबदार मूँछे देख
वह पिंजरे में भी
फुदकती न थी
सतर्कता से
हर आदेश सुनती, मानती
प्यार नहीं करती
डरती है
मूँछों के रौब से।

बूटों के साथ रौबदार मूँछे
होते ही घर में दाख़िल
आग नज़रें लेती हैं जायज़ा
एक-एक कोने का
घर ख़ुश
अपनी सुन्दरता-सुघड़ता पर
कि आज नहीं छूटा
एक भी काम
आज नहीं टूटा
एक भी नियम।

आग नज़रें
ख़ुश हैं अपनी क़ाबिलियत पर
उन्हें पता है
कुछ तो छूटा ही होगा
इतने सारे कामों के बीच
वो नियम तो टूटा ही होगा
जो बना ही नहीं अब तक।

हर रोज़
नया नियम बनाना
मीन मेख निकलना
शग़ल है उनका।

अचानक मूँछे हिलतीं
रौब से और नुकीली होतीं
वक्र त्योरियाँ बूट के साथ
उतर जातीं
भीतर तक,
रात की चीख़ें रुदन
सुबह चूड़ी खनकाते
लग जाती हैं
मूँछों की ख़िदमत में
आदेश पालन में
ममता लुटाने में
मकान को घर बनाने में।

पर आज
शरीर पर बूटों के दाग़ लिए
चूड़ी भरे हाथों ने
खोल दिया पिंजरा
जहाँ मैना क़ैद है।

प्रश्न बिद्ध

उसके शरीर पर अब
नहीं पड़ते नील के दाग़
ख़ून नहीं रिसता घावों से
पड़ोसी ख़ुश
भला आदमी
प्यार करता है
औरत से।

अब शरीर नहीं
मन पर छूटते हैं निशान
बनते हैं अनगिनत घाव
ख़ून नहीं, दर्द बहता है
नसों में
शब्दों के हथौड़े चलते हैं
तड़.. तड़.. तड़..।

टूटती है वह
रोज़
किरच-किरच
बिखर जाती है
विरोध की एक भी आवाज़
कर देती है
रिश्ते का अन्त।

घेर लेता है समाज
सवालों के घेरे में
गाड़ देता है
नुकीले प्रश्न
तोहमतें
जिनसे बिंध जाती है स्त्री
ताउम्र।

सीटी

आग पर चढ़ाते ही कूकर
गर्म होकर
खदबदाने लगता है
और बज उठती है
सीटी।

सोचती हूँ
उत्पीड़न की आग पर
सदियों से
चढ़ाए जाने के बाद भी
गर्म होकर
क्यों नहीं खदबदाता कुछ भी
स्त्री के भीतर?
क्यों नहीं बजती
चेतना की सीटी?!