1

नदियों में लहलहा रहा था पानी
और खेतों में फ़सल,
देखकर हर ओर हरियाली
हरा हो ही रहा था मन
कि अचानक फट पड़ता है
बेवक़्त काला पड़ा हुआ बादल,
किसान के चेहरे को
सफ़ेद कर देता है।

2

क्या क़यामत है
कि एक पूरी क़ौम निकली है भूखी ही
एक छत की आरज़ू में
और बेतहाशा गिर रहे हैं ओले
खुली हुई सड़क पर!

3

हम अपने युग का इतिहास
लिखवाएँगे इस तरह
कि हम मजबूर थे घरों में दुबकने को
जबकि बाहर हमारे अपनों को
हमारी ज़रूरत थी।

4

कर्फ़्यू सुना था
उसने देखा नहीं था
पर बहुत से लोग थे उसकी निगाह में
जिनके हाथ में बरकत थी

वह बहुत घरों के आगे से गुज़रा
थाली-कटोरा बजाते हुए
आख़िरी घर के पास आकर
उसे यक़ीन हो गया
सब मर गए हैं भूख से।

5

रोज़ दुत्कारे जाने वाले भिखारी को
तीन दिन तक करवाया गया
भरपेट भोजन,
उसे ईमान आ गया लोगों पर
कि लोग जागते हैं कभी-कभार।
वह खाँसते हुए बता रहा है
कि दिया गया है उसे भी एक रुमाल
हमेशा मुँह पर बाँध के रखने के लिए

सप्ताह भर बाद
मिला वही भिखारी
रुमाल चिगलते हुए।

6

उसने दर्ज करायी है शिकायत
कि घर में कुल आठ सदस्य हैं
और भोजन के पैकिट में
रोटियाँ केवल पाँच हैं,
एक पैकिट और मिल जाएगा
तो क्या दो अधिक रोटियों से
किसी का पेट फट जाएगा?

7

मुर्ग़े बने हुए हैं आदमी
और डण्डे लिए खड़े हैं पास ही वर्दी वाले भी,
दूर तक नज़र नहीं आ रहा
एक भी दुपहिया-चौपहिया।
ज़ाहिर है मज़दूरों की एक क़ौम
मजबूरों की तरह निकली थी।

8

जानवर बना हुआ आदमी
मना रहा है जश्न
बजा-बजाकर डण्डे,
ठण्डे पड़े हुए पेट का चमड़ा
भला कब तक साथ देगा!

9

आ गया है आदमी के हाथ में
यह किस तरह का खिलौना
कि दोनों अँगूठों को करता है
मुँह की तरह इस्तेमाल
और चाहे जहाँ थूक देता है।

10

यह बहुत नाज़ुक समय है
मन्दिर को नहीं बनाया जा सकता
आइसोलेशन सेन्टर,
पुजारी का कहना है
ईश्वर क्वॉरेन्टीन चाहता है।