सहूलियत

मुझे ज़िन्दगी के लिए सारी सहूलियत हासिल हुई
मगर ज़िन्दगी—
उसका कुछ अता-पता न था!
जो था इस जिस्म की नौ-नाली में
वह विज्ञान की दृष्टि से क़तई चमत्कारिक नहीं था
मगर दुनिया की आधी आँखों के लिए
यह रहस्यों से भरा एक कुण्ड था
कई साधु, कई पण्डित, कई नामी-गिरामी,
मौलवी, क़ाज़ी और यहाँ तक मेरा मसीहा भी
हमेशा यह जानने की फ़िराक़ में रहे
कि आख़िर इसमें है क्या!

कई डुबकी लगाकर मौज़ लेते रहे
कई लहर-दर-लहर नज़र से ब्यौरा लेते रहे
कई कूदे, कई डूबे, कई मरे
कोई नहीं बचा
आँचल की कहीं से कोर फटी तो दर्ज़ी नहीं
कोई पुराना वाहियात वाक़िया याद आया
मेरी गर्दन से ढुलकते हुए पसीने का कोई और ही अर्थ था
मेरी चाल से अंदाज़ लगते थे
कि कितनी जी-हुज़ूरी के बाद
मैं उनके लिए ज़ायकेदार हो जाऊँगी।

मैंने उम्र-भर एक रसोइये का काम किया
लेकिन अपने स्वाद को भी जीभ पर कभी रख न सकी
मेरे हिस्से जो देहरी आयी थी
वह मेरे पाँव के एक डग भरने पर ख़त्म हो जाती थी
मेरे भाग में जो बिस्तर आया था
उस पर सिलवट की तरह बिछने के लिए
मुझे हद से ज़्यादा जगह दी गयी
मैं ज़िन्दगानी की छाती पर सहमा हुआ
साँस का एक ढेला-भर थी
जिस रोज़ बारिश आती थी
मैं मिट जाती थी
मुझे ज़िन्दगी के लिए सारी सहूलियत हासिल हुई
मगर ज़िन्दगी…
उसका कुछ अता-पता न था।

हिज्जे की ग़लती

मेरे हिस्से का सारा समन्दर चाट जाओ
और स्वाद के लिए मेरे बस ये दो आँसू रहने दो
मैं कभी नहीं चाहूँगी कि कोई मेरे दुःख को पेय समझे
मैं हज़ारों दर्द घोंटकर पी चुकी हूँ।

न ही मेरी मंशा है कि
मेरे हिस्से में हिज्जे की ग़लतियाँ आएँ
मैं सुखी हूँ
मुझे सूखी हुई धरती समझ
तुम ग़ुरूर ताने मेरी छाती पर मत चलो।

हत्या का आरोप

वह ग़ुस्से में आया
और मेरी किताबों के पन्ने हवा में उड़ा दिए
उसे लगा
उसने मेरे वजूद को धुआँ-धुआँ कर दिया
उसे लगता था
किताबें सर पर चढ़कर नाचने लगती हैं
जबकि सच यही था
कि वह एक पेड़ की हत्या में
दूसरी बार शरीक था

वह ग़ुस्से में आया
और मेरे कपड़ों के लीरे हवा में उड़ा दिए
उसे लगा
उसने मेरी इज़्ज़त को तार-तार कर दिया
उसे लगता था सुन्दर देहें
उसे बड़ा-सा ठेंगा दिखाकर इतराती रहती हैं
जबकि सच यही था
कि वह एक देह की हत्या में
कई-कई बार शरीक था

इस तरह उस पर
एक पेड़ की दो बार
और एक देह की बार-बार हत्या का आरोप था
पेड़ों के समुदाय ने उसे माफ़ कर दिया था
आख़िरी समय में
उसके लहूलुहान जिस्म के साथ
बस एक पेड़ गया था
उसे लहूलुहान करने में एक देह का हाथ था
देहों का समाज अभी इतना बड़ा नहीं हुआ
कि उसे क्षमा कर दे (और होना भी नहीं चाहिए)

अकेली देह की बात होती तो और बात थी
एक आत्मा भी थी
जिसकी वजह से इस देह में नेह था
उस पर देह के साथ नेह की हत्या का भी आरोप था।

टीस

एड़ी तले क्या आया?

थी यह एक काँटे की ठसक
या किसी नोंक की कसक
तुम क्या जानो
वह तो आया
द्वार बनाया
धँस गया

फिर बाहर क्या आया
एक रक्त का छींटा
या सोखे गए आलते की बूँद
तुम क्या जानो
वह तो आया
आज़ाद हुआ
मुस्काया।

अकारण तो नहीं

मेरी देह से लिपटा है
एक कथन जो श्रव्य नहीं है,
कभी वाणी ने प्राणों से कहा था

मेरे चित्त पर चिपका है
एक वचन जो लेख्य नहीं है,
जो तुमने किया था मुझसे
स्वच्छन्द होकर, उन्मुक्त होकर

कभी घुलती है मिश्री-सा,
कभी ढुलती है शहद होकर,
प्रेम की कोई व्यथा-कथा
बुन रहा है समय
तुम्हीं कहो, ये अकारण तो नहीं

किनारों के निराश पत्थर तुम
भीगते हो मेरी साँसों के छींटों से,
मैं हो जाती हूँ नदी-सी
तुम रेत-सा दूर तक साथ बहते हो

मैं तोड़ना चाहती हूँ बंधन
पर मेरी तह में लेट जाते हो तुम
केवल क्रन्दन था छाती पर
अब कलरव है, स्पन्दन है
कोई प्रणय कविता देखो
समय रच रहा है,
तुम्हीं कहो, ये अकारण तो नहीं।

Book by Rahul Boyal: