आपत्तियाँ

ट्रेन के जनरल डिब्बे में चार के लिए तय जगह पर
छह बैठ जाते थे
तो मुझे कोई आपत्ति नहीं होती थी

स्लीपर में रात के समय सिर्फ़ मैं सोता अपनी बर्थ पर, भले ही दिन के वक़्त थोड़ी-सी आपत्ति के साथ तीन के लिए आरक्षित जगह पर बिठा लूँ चौथा और पाँचवा आदमी

लेकिन एसी कोच में तो कभी भी किसी अन्य के लिए
कोई जगह बची ही नहीं
वहाँ सिर्फ़ मैं रहा अपनी आपत्तियों के साथ।

छोटे-से झोपड़े में दनदनाते हुए घुसकर पैर पसारकर बैठ जाता हूँ
पर किसी बड़े बंगले के बाहर खड़े रहने पर भी
आँख दिखाने लगती हैं बंगले के फाटक पर खड़ीं आपत्तियाँ।

धरती पर मौजूद हैं बेशुमार ख़ाली जगहें जहाँ बेफ़िक्री से
बसर कर सकते हैं कई बेघर पर वहाँ इन बेघरों की जगह
घर किए हुए हैं किन्हीं लोगों की आपत्तियाँ।

दुनिया में जितने लोग नहीं रहते, उनसे कहीं ज़्यादा रहती हैं आपत्तियाँ।

जब व्यक्ति ठसाठस भर जाता है सुख सुविधाओं से
तब उसके पास सबसे ज़्यादा जगह होती है आपत्तियों के लिए।

आजकल

शोर सच्चाई का पर्याय बन चुका है
धीमी आवाज़ें बड़ी सरलता से
झूठ में तब्दील कर दी गई हैं
काक को इतनी बार इतने ऊँचे-ऊँचे स्वरों में
सुना गया है कि
उसे अब कोयल से अधिक सुरीला माना जाने लगा है
विरोध का स्वर इतना बेसुरा है कि
उसे सुनना और विरोधी का जीना निषिद्ध है
भीड़ से इतर खड़ा आदमी या तो पागल है या महामूर्ख और
उसकी दुबली-पतली-सी आवाज़ भीड़ के
कोलाहल के मीटर से बाहर है…
एक पंक्ति में चींटियों की तरह चलने को
आदर्श मनुष्य की परिभाषा के तौर पर स्वीकृति मिलने लगी है
और सोचने-समझने की प्रवृत्ति को
एक भयंकर विकार की संज्ञा दी जाने लगी है…

कुछ पागल सिरफिरे फिर भी कोयल की
कूक सुनते हैं, सोचते हैं
आवाज़ उठाते हैं…
बेवक़्त गोलियों से दाग़ दिए जाने की
परवाह किए बग़ैर!

बचपन

बचपन को याद करते वक़्त
याद आता है स्कूल
जो सन सैंतालीस से पहले का
भारत लगता था
और छुट्टी प्रतीत होती थी आज़ादी-सी

याद आते हैं गणित के शिक्षक
जिनके कठोर चेहरे पर
चेचक के दाग़ ऐसे लगते थे मानो
किसी भयावह युद्ध के हमलों के निशान,
मुलायम पीठ पर लटके
किताबों से ठुँसे हुए भारी-भरकम झोले
याद दिलाते थे
उस दिहाड़ी मज़दूर की जो अपनी पीठ पर
ढोता है सीमेंट की बोरियाँ,
क़ैदियों के धारीदार कपड़ों की तरह
सफ़ेद और नीली पोशाकें
और पुलिस के डण्डों की भाँति
दम्भ से लहराने वाली हरी साँठें
जो हम बच्चों के जिस्म पर दर्ज कराती थीं
लाल और नीले रंग में अपनी उपस्थिति

बचपन के उन कोमल दिनों की स्मृति
भरी पड़ी है बस कठोर पलों से
जिनमें
“नन्ही हथेलियों का छूना आकाश
और छोटे तलवों का नापना ब्रह्माण्ड”
जैसी कल्पनाओं का कहीं ज़िक्र
तक नहीं…

मज़मून

मेरे हाथों में है ख़ाली लिफ़ाफ़ा
मज़मून कहाँ अंतर्ध्यान हुआ नहीं पता

हम साथ रह रहे हैं
एक रिश्ता है हमारे दरमियाँ
एक आवरण है जो बाहर से
बहुत सुंदर है
इतना सुंदर कि देखने वालों के भीतर
ईर्ष्या के बीज अंकुरित हो जाएँ

मैं ख़ाली लिफ़ाफ़े को देखता हूँ
और फिर हमारे रिश्ते को

मज़मून की अनुपस्थिति के खेद का अंदाज़ा केवल
लिफ़ाफ़ा खोलने वाले हाथ ही लगा सकते हैं।

विन्यास

पतझड़ का मौसम बारह महीने का हो गया है
बसंत अब सपनों में भी नहीं आता
कुछ कवि अपनी कविताओं में
बसंत लाने का प्रयास करते हैं
काग़ज़ पर बीज बो दिए जाते हैं
एक पेड़ उगता है नयी, नरम और
हरी पत्तियाँ लिए
सब्ज़ सुगन्धित हवा चलती है
बसंत का अनुभव होना शुरू ही होता है
कि दीमक का झुण्ड धावा बोल देता
है दरख़्त पर…

यह एक तरीक़े का विन्यास है
बलिष्ठ वर्ग का पतझड़ के साथ
जो किताबों पर प्रतिबंध लगाकर
नयी पौध को आने से रोकता है।

झुण्ड

हमने खो दी है अपनी आवाज़
हमने खो दिए हैं अपने चेहरे
हम भूल चुके हैं अपना व्यक्तिव
हमें बस याद है अपने समूह का झण्डा
हमें कण्ठस्थ हैं अपने समूह के नारे
हम यह मान चुके हैं कि
शर्मसार करने वाला काम होता है
एक इंसान होना
और भेड़ होने से ज़्यादा गर्वीला
कुछ भी नहीं।

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राहुल तोमर
निवासी: ग्वालियर, मध्यप्रदेश कथादेश, जानकीपुल आदि पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।

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