सन्नाटा

हवावों का सनन् सनन्
ऊँग ऊँग शोर
दरअसल एक डरावने सन्नाटे का
शोर होता है,
ढेरों कुसिर्यों के बीच बैठा
अकेला आदमी
झुण्ड से बिछड़ा
अकेला पशु
आसानी से महसूस कर सकता है,
इसके लिए सरल है
भेदना कपाल अस्थियाँ,
रात के अन्धेरे की चीख़ें
सन्नाटे को भेद नहीं सकतीं
गहरा देती हैं,
हत्यारा
सन्नाटे से ही घेरता है
शिकार,
सन्नाटा होता है
देवों का रुदन,
धरती के संकटों में
क़ब्र के भीतर रखी चीज़ें भी
कम नहीं करतीं
अन्दर का सन्नाटा,
सन्नाटा
युद्ध का असली हथियार है
युद्धक मशीनों का शोर
सन्नाटे का शोर होता है
जब हमें माननी पड़ती हैं
दूसरों की बातें
तब सन्नाटा ही होता है
हमार बीच,
बड़े-बड़े ध्वनि विस्तारक यन्त्र
सन्नाटे की परतें बिछाते हैं
हमारी आवाज़ के चारों तरफ़,
सन्नाटे को कोई मार नहीं सकता
वह राजा है।

साँप

1

साँप
मनुष्य ही होंगे
अपनी योनि में
पर साँपों के सपने
मनुष्यों जैसे नहीं होते होंगे,
अक्सर आते हैं
साँप
मनुष्यों के सपने में
पर साँपों के सपने
कदाचित मुक्त होंगे
मनुष्यों से।

2

साँपों को
नहीं पता
वो विषधर हैं
मर जाता है
मनुष्य
उनके काटने से,
साँपों को
यह भी नहीं पता कि
क्यों हो रही हैं
हत्याएँ।

दाढ़ी

रोज़
बढ़ जाते हैं
वृक्षों की कोपलें
घास की फुनगियाँ
उत्तर का पहाड़
और
मेरी दाढ़ी,
मेरा शेव करना
रोज़
गहरा कर देता है
मेरा विश्वास
कि
मैं जीवित हूँ।

रिश्ते

रिश्ते
उम्र की तरह
पुराने होते कुर्ते की गिरह जैसे
दरक जाते हैं
अपने ही बोझ से,
विस्मृत होती जाती है
एक असहाय चीख़।

तुम हँसी थीं

तुम हँसी थीं
तभी हुई थी सुबह
पुष्पदलों से टपक उठी थी ओस बूँदें
तुम हँसी थीं
तभी झरने लगा था हार सिंगार
मेरी नेह की चादर में
तुम हँसी थीं
तभी सार्थक हो उठा था
मेरा स्पंदन
तुम हँसी थीं।

भूल गया

मैं
भूल गया
तुमको
जैसे
शाम भूल जाती है
दिन
नाव भूल जाती है
मुसाफ़िर
लहरें भूल जाती हैं
हवा
तर्क भूल जाता है
तकलीफ़!

शब्द

तुम कहना
कुछ भी
एक आवाज़ होगी
तुम गिनना अपने शब्द
सुनेगा वही
जिसे कहा गया होगा,
ख़ामोश शब्द
काटते बहुत हैं
इसे वही समझता है
जहाँ खुला रहता है
दिन-रात
शब्दों का कॉफ़ी-हाउस
शब्दों की शाश्वतता
इस लिहाज़ से है कि
आजतक नहीं लौटा
कोई भी शब्द
बिना अर्थ के
शब्द शाश्वत हैं
इस लिहाज़ से भी कि
आज तक नहीं रहा
कोई भी शब्द
अनसुना।

रास्ते

सपनों में
नहीं पूरते रास्ते
मैं चलता रहता हूँ
रास्ते में पूछता हूँ
किसी अनजान अपने से
मेरे गाँव का सही रास्ता
वह बताता है
मेरे गाँव पाँच सड़कें जाती हैं
सभी चौड़े राजमार्ग हैं
चलते रहो
मुझे केवल बियाबान दीखते हैं
मैं चलता रहता हूँ
जहाँ तक देख सकता हूँ
बियाबानों से सड़कें गुज़र रही हैं
कोई शहर नहीं
दूध जलेबी नहीं
प्यास से जाग जाता हूँ
पानी पीकर सोता हूँ
इस बार कोई नयी सड़क है
मेरे गाँव जाने के लिए
फिर पूछता हूँ
किसी अनजान अपने से
क्या मेरे गाँव की यही सड़क है
वह कहता है
तुम्हारे गाँव की पाँच सड़कें हैं
तुम्हें सभी नापनी होंगीं
तभी पहुँचोगे गाँव
मेरा स्वप्न टूट जाता है।

यादें

यादें
जैसे हवा का एक अतिरिक्त टुकड़ा
फेफड़ों में ठहरा हुआ
जैसे
नीले आसमान में एक सफ़ेद बादल
सर के ठीक ऊपर, साथ-साथ
जैसे
एक फूल मुरझाया हुआ
डाल पर
जैसे
जोड़ी नरम पाँव
थाली भर पानी में
जैसे
कोई मन्त्रोच्चार
अनसुना
जैसे
कोई आया हो देह से दूर
सदा के लिए।

सुन्दर स्त्रियाँ

ईश्वर
और
बुनकर
याद आते हैं
सुन्दर स्त्रियोँ को देखकर।

एक उदास कविता

अस्पताल के बिस्तर पर
उसे इन्तज़ार है
अपनों का
दवा और फल से ज़्यादा
कोई अपना जो लाँघकर
गाँव की ग़रीबी
शहर का जाम
थाम ले काँपते हाथ
और खुल जाए
आँसुओं की गठरी
खट्टी-मीठी
कोई अपना
जिसकी स्मृतियाँ ही
उजास हैं
मृत्यु की अन्धेरी सड़क पर।

मेरा गाँव

मेरा गाँव
कल सीवाने पर ही मिल गया
बूढ़ा हो चला है
शिकायतें करने लगा
मेड़ों
रास्तों
सरकारों की
मुझे मेरे पिता के नाम से
पहचानता है
परेशान था
बेटे को हार्निया की बीमारी हो गयी है,
चल फिर नहीं सकता
बहू बात-बात में
ट्रेन से कटने का ज़िक्र करती है,
चारो पोतियाँ
कुपोषित नवयौवन के द्वार खड़ी हैं,
उनकी आँखें
स्याह झील की तरह
अपारदर्शी
सपनों का श्मशान बन चुकी हैं,
किसी उम्मीद की जल्दबाज़ी में
नहीं दीखता
मेरा बूढ़ा गाँव
देर रात लौटते हुए
सोचता हूँ
मेरी स्मृतियों में बसा गाँव
आख़िर कब तक
मुझे याद रखेगा।

दर्द

दर्द है उसमें
पर शिराएँ पत्थर की हैं
सूखे फूलों की गन्ध से
महक उठती है
देह की मिट्टी
साकार एका है
भाव-रूप का
प्रेम का देवत्व है
उसमें।

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राकेश मिश्र
(जन्म: 30 नवम्बर 1964) निवासी: लखनऊ। भारतीय प्रशासनिक सेवा में कार्यरत। कविता संग्रह: 'शब्दगात', 'अटक गई नींद', 'चलते रहे रातभर', 'ज़िन्दगी एक कण है'।

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