मैना

निष्ठुर दिनों में देखा है
कोई नहीं आता।
मैना की ही बात करता हूँ
कई मौसमों के बीत जाने पर आयी है
मैं तो बच गया—
विस्मृत हो रही थीं
तोता और मैना की कहानियाँ।

घर स्थिर है ज़ंग लगी साइकिल की तरह

कोई था जो अब नहीं रहा
कोई है जो अपनी दिव्यता का शिकार हुआ
मारा गया कोई अपनी चुप्पी में
कोई अतीत की चिड़ियों के पीछे भागा
एक घर है जो रहा स्थिर
ज़ंग लगी साइकिल की तरह।

घर

घर लौटना हो नहीं सका
किसके स्वप्न में नहीं आता घर
कौन घर नहीं लौटता
कितना अच्छा था हमारा घर
पर हम लौट नहीं सके
चलते हुए ठेस किसे नहीं लगती
पर हम तो मर गए।

बुद्ध

घर से बाहर निकलता हूँ
घड़ी देखता हूँ
नहीं
समय देखता हूँ
सोचता हूँ— कितना पहर बीत गया
बदहवास-सा लौटता हूँ घर
बच्चों की तरह पूरे घर में दौड़ लगाता हूँ
मैं चाहता हूँ— कोई घर छोड़कर नहीं जाए।

मिलना

उसके शरीर में
ख़ून की जगह आँसू थे
उससे जब भी मिला
महसूस की
आषाढ़ के मौसम की नमी
अपने आस-पास।

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रोहित ठाकुर
जन्म तिथि - 06/12/1978; शैक्षणिक योग्यता - परा-स्नातक राजनीति विज्ञान; निवास: पटना, बिहार | विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं बया, हंस, वागर्थ, पूर्वग्रह ,दोआबा , तद्भव, कथादेश, आजकल, मधुमती आदि में कविताएँ प्रकाशित | विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों - हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, अमर उजाला आदि में कविताएँ प्रकाशित | 50 से अधिक ब्लॉगों पर कविताएँ प्रकाशित | कविताओं का मराठी और पंजाबी भाषा में अनुवाद प्रकाशित।

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