1

कुरेदता हूँ
स्मृतियों की राख
कि लौट सकूँ कविता की तरफ़

एक नितान्त ख़ालीपन में
उलटता-पलटता हूँ शब्दों को
एक सही क्रम में जमाने की
करता हूँ कोशिश

ज़िन्दगी की बेतरतीबी को
मिलाता हूँ शब्दों से
काँटता हूँ, छाँटता हूँ
कि कहीं से निकल आए जीवन

वो‌ जो किताबो में लिखा है
वो‌ जो शब्दों में बड़ा है
उसे मिला सकूँ
उसे जमा सकूँ

बस इसी कोशिश में बार-बार
उतरता हूँ भीतर
कुरेदता हूँ

बार-बार लौटता हूँ कविता की ओर
मगर कहीं भी जम नहीं पाती कविता

मुझे लगता है भीतर से बड़ी है कविता
मेरे कुरेदने से वह बाहर तो आती है
मगर अनुकूल शब्दों के अभाव में
वह काग़ज़ पर‌ उतरते-उतरते मर जाती है।

2

बसन्त आया है

घर के आँगन में औरतें
लीप रहीं गोबर

वे नहीं जानतीं
बसन्त को

मगर वे जानती हैं
आँगन में खड़े बूढ़े पेड़ की
सरसराहट को

वे हिल-मिल गई हैं पेड़ से
वे जानती हैं उसके हरे होने का सुख

हालाँकि बसन्त से आज भी अनजान हैं
गोबर लीपतीं औरतें

वे नहीं देखतीं फूलों का खिलना
उनके लिए ज़रूरी है चूल्हे का जलना।

3

कुछ तो है जो छूट गया है

मैंने देखा है चेहरे के
उतरते हुए रंग
जिस पर छूट गई है उदासी

एक टूटते हुए तारे को देखते हुए
याद आती है हथेलियाँ
जिनमें छूट गई हैं रेखाएँ
आड़े-टेढ़े होकर
भटक गए हैं स्वपन

बिखरे हुए शब्दों में
सहेज ली कविता मगर
भावों के ढह गए घर
छूट गए अर्थ

कुछ तो है जो छूट गया है

एक उबाल को भरकर
भागती हुई दुनिया में
मतलबी प्रेम को उठाए
छूटते रहे रिश्ते

मैं जानता हूँ
छूटते-छूटते समय
एक दिन छूट जाएगी पृथ्वी।

4

वेदना से खिली हुई कलियों से
झर रही है ओस

अपना मधुकोष लुटाती
वह कली नभ के समान झुकी हुई
बड़ी नम्रता से
झेलती है दुःख

यही वह समय है
जब पवन भरकर ताप
सौंपती है कली को

और कली झुककर कर देती है उसे
एक सुखद सुगंधमय बयार

यही तो है प्रेममय व्यवहार
मिलकर दोनों हुए एक-सार।

5

आँगन के बाहर
चबूतरे को याद है
मेरा उस पर लोटना

अब मैं बड़ा हो गया हूँ
हालाँकि चबूतरा अब भी वही है

मैं जानता हूँ
चबूतरे पर पीढ़ियों का बोझ है
मगर फिर भी वह हल्का है

अब मैं न चबूतरे पर बैठता हूँ
न लोटता हूँ, न ही पल भर के लिए
ठहरता हूँ

चबूतरा जानता है
मेरी मजबूरी, मेरी मनोदशा
वह एकटक देखता है मुझे
और अपने हल्केपन से अकुलाता है
वह मेरी पीड़ाओं को चाहता है
अपने भीतर भरना

यह चबूतरा पीढ़ियों से ख़ामोश है
इसी जगह पर चबूतरे पर कभी बैठती थीं
मोहल्ले की बुज़ुर्ग महिलाएँ
उनकी सारी कहानियाँ-कथाएँ
चबूतरे के भीतर घूम रही हैं

चबूतरा कहीं नहीं गया
वह कहीं नहीं जाएगा
मगर धीरे-धीरे चली गई है
उसके भीतर छुपी हुई कहानियाँ
मोहल्ले की संवेदनाएँ
पीढ़ियों की कथाएँ

और चले गए हैं
वो सभी लोग
जो सुनना जानते थे
उसकी आवाज़

आज चबूतरा ख़ामोश है
अपने हल्केपन में
एक भारी उदासी लिए

और मैं भी हो चुका हूँ संवेदनहीन
अपने अकेलेपन को लेकर।

6

मैं शहर में हूँ
मेरे भीतर गाँव है

एक भीड़ को लेकर गुज़रता है शहर मगर
एक नितान्त एकाकीपन के साथ
यहाँ शोर भी तनहा है

यहाँ सब कुछ ख़िलाफ़ है
जो ज़िन्दगी के विरुद्ध खड़ा है

आदर्शों के ऊँचे मचान पर बैठा है एक शिकारी
जो मूल्यों पर दाग़ता है गोली
हर आदमी इससे बचकर भागता है
और अपनी ज़िन्दगी पर हाँफता है

सदा के लिए बन्द हुईं खिड़कियों से झाँकती है धूल
जिनके बोझ से हवा झेलती है भारीपन

तपती हुई सड़कों पर जो भी गुज़रता है
जल जाता है और अधिक
यहाँ बेनक़ाब चेहरों पर कई पर्दे हैं
जो कहाँ खुलते हैं कुछ ख़बर नहीं

इस शहर में
हर आदमी
जम गया है इन काली सड़कों पर
अपने सफ़ेद वक़्त को बिछाकर

मैं शहर में हूँ
और भूलता जा रहा हूँ
मेरे भीतर एक गाँव है।

7

ज़िन्दगी के गहरे धुंधलके से होकर
कविता के जुगनूओं को देखा है

मुझे नहीं पता रोशनी का सुराग़
पहाड़ों से गिरते सपने
एक धरातल पर छप गए हैं

आवाजाही ने दुनिया की
मिटा दिए हैं निशान

एक ख़ाली सुबह और एक काली रात के बीच
एक अँधेरी खोह से निकलती है कविताएँ

नहीं है कुछ भी यहाँ
जिसे सजाया जा सके सलीक़े से
बिखरे हुए शब्दों की चीख़-चिल्लाहट के बीच
चुपके से रोती है कविता

पृथ्वी पर सिर्फ़ घूमता है समय
संघर्षों के चेहरे पर बढ़ाकर झुर्रियाँ

मौसम गुज़रते हैं
सदियों की सिहरन लेकर
डरती है दुनिया उनकी पदचाप से

अब ऐसे समय में जब कि ज़रूरी था अमल करना
सदियों से लिखे जा रहे प्रलाप का

और बोझ गढ़ा जा रहा है
शब्दों के माथे।

8

मैं दूब को देखकर लिख रहा कविता
दूब के पास एक नरमी है
जो कविता में नहीं मिलती

ज्यों-ज्यों आगे बढ़ती है कविता
एक कठोरता घेरती जाती है शब्द

धीरे-धीरे बाहर हो जाती है कविता
अपनी नमी को सोखते हुए

एक कठोरता के धरातल पर बिखर जाते हैं शब्द
जिनकी साँस तो चलती है मगर
संवेदना मर जाती है।

9

नदी पेड़ और झरनों में
रहती है स्त्री

वह नभ और धरा के मध्य
बनाती है एक अदृश्य पुल प्रेम का

धान की बालियों का मुस्कुराना हो
या पेड़ों पर पंछियों का चहचहाना हो

सृष्टि के सभी दृश्य
जिनमें भरा हुआ है प्रेम
वहाँ एक स्त्री है

स्त्री के पास जागृति है
चेतना है

जब तक वह है तब तक
डरे रहेंगे दुःख
टलती रहेंगी विपदाएँ।

10

इस व्याकुल हृदय में
सभी कुछ अधूरा है

अधूरे सुख और अधूरे दुःखों के बीच
पिसता है अन्तर्मन
न जान सका जो बुद्धि के दाँवपेच

अधूरी अधपकी यातनाओं के अन्तहीन सफ़र
सुखों के अधूरे अंध स्वप्न

कौन जान सकेगा अधूरे रास्तों पर भटके
अधूरे लोगों को जो कहीं न पाएँ पहुँच

सोचता हूँ अक्सर
सब कुछ अधूरा लेकर
कितना कठिन है पूरा जीना।

11

झरता है जो नयन से
वह सिर्फ़ अश्रु ही नहीं

उसमें सम्मिलित होता है
एक पिघला हुआ अहम

एक दुःख का खारापन
एक ख़ुशी का हल्कापन

वह जब भी गिरता है नयन से
बहुत कुछ उठा देता है भीतर।

12

अधपकी-सी ज़िन्दगी
आधे-अधूरे ख़्वाब

एक टूटा सच
एक फटी चादर

एक व्यथा का बोझ
और टूटा हुआ जिस्म लेकर

कमबख़्त जंगल से तो फिर भी
गुज़र जाए

कोई बताए
दुनिया में किधर जाए।

13

मैंने भी देखा है हरा होना

थके हुए चेहरे पर धूप का उतरना
पल-भर के लिए उसका चमकना

अपनी सच्चाई को लादकर
दीवार को फाँदना
एक खुले आसमान के चेहरे पर
अपनी सम्भावना आँकना

मैं जानता हूँ क्या होता है डरा होना

हाँ यह सच है हार के बाद भी
फिर हारना होता है
ख़ुद को ज़िन्दा रखकर
बार-बार मारना होता है

मुझे पता है
कितना मुश्किल है खरा होना।

14

एक दिन मैंने भी एक चित्र को देखकर
लिखी कविता

चित्र में कई मनमोहक रंग थे
मैंने भी कविता में भरे रंग

चित्र की सुन्दरता को
कोशिश की मिलाने की
कविता से

क्योंकि चित्र आदमी का था
मैंने चित्र में तलाशे आदर्श
सभ्यता को सभी कोनों से ढूँढा
आदमी को सभी ओर से खंगाला

मैं धीरे-धीरे दुविधा का होता रहा शिकार
कि चित्र की सुन्दरता को बचाऊँ
या चित्र में खोए आदमी के आदर्श, सभ्यता को बचाऊँ

मैंने अपना इरादा बदला
और चित्र से बाहर निकलकर कविता को तलाशा
और आदमी, आदर्श और सभ्यता को
कविता के भीतर तराशा।

गोलेन्द्र पटेल की कविताएँ

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