बुद्ध की प्रतीक्षा, अप्राप्य का सुख

Poems: Santwana Shrikant

बुद्ध की प्रतीक्षा

तुम्हारा-
कानों के पीछे चूमना
आत्मा को छूना है जैसे,
होठों को चूमना
सूर्य की रश्मियों को
रास्ता देना था।
मेरी देह में
उतर रहे हो तुम
रक्त कणिकाओं की तरह,
असम्भव-सा लग रहा
रक्त कणिकाओं के बिना
देह का भविष्य।
सदी की महत्त्वपूर्ण
है यह घटना,
जिसकी साक्षी है
ये छुअन
जो अंकित है
तुम्हारे हृदय में,
धड़कती रहेगी यह
सदी के अंत तक
बुद्ध की प्रतीक्षा में…।

अप्राप्य का सुख

मैंने प्रेम में होने का इतिहास
दर्ज कर दिया है
तुम्हारे माथे पर,
दंतकथाओं के साक्ष्य भी
कर दिए हैं समर्पित तुम्हें,
तुम्हारे स्वयं में होने के
मायने कर दिए हैं लिपिबद्ध।
अंकित कर दिया है
अपने वर्तमान और
भविष्य में तुम्हें…
ताकि सदियों तक
जीवित रहे-
अप्राप्य का सुख।

यह भी पढ़ें:

नित्या शुक्ला की कविता ‘अप्राप्य का सुख’
निधि अग्रवाल की कविता ‘एक और बुद्ध’
अर्जुन डांगले की कहानी ‘बुद्ध ही मरा पड़ा है’

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