1

कितनी कहानियाँ शुरू होती हैं
शहर का कोई भी दोराहा
इतना सुनसान कभी नहीं होता
कि वो किसी के ख़यालों में भी न आए
सब अपने-अपने शहरों के दोराहों पर खड़े होकर
कुछ न कुछ सोचते हैं अक्सर
और बहुत अक्सर
कोई न कोई राह चुनने की आदत उन्हें
वहीं लगती है।

अक्सर लगता तो है
कि काग़ज़ पर लिखने से
मज़बूत हो जाएगा क़िस्सा
लेकिन उसका ज़ायक़ा तो
एक ज़ुबान से दूसरी ज़ुबान तक जाते-जाते
और नमकीन हो जाने में ही है।

हम कितना भी बंधे रह जाएँ
शाम में घर वापस जाते किसी रेवड़ से
ज़िन्दगी जहाँ ले जाना चाहती है
वहाँ ले जाकर ही मानेगी
हमारी कोई बात कहाँ सुननी है इसने।

2

भूले को फिर याद करना
प्रार्थना है या नहीं?
अगर प्रार्थना करने का
बस यही ढंग आता हो तो
यह प्रश्न व्यर्थ है।

अगर गए हुए को
वापस बुलाने का एक ही तरीक़ा हो
और वह तरीक़ा भी न आता हो
तो कोई मतलब नहीं है
वापस बुलाए जा सकने की बात का।

हँसने की बस एक वजह
और रोने की बस एक धुन
गाने का बस एक सुर
सोचने को बस एक ख़याल
और वो सब भी नहीं
इन सबके होने का कोई अर्थ नहीं।

3

तुम सीखना वो लय
जो नहीं पा सका मैं
गाना वो गीत जो
गाते हुए सोचता रहा तुम्हें
आना उस इंतज़ार में
जिसमें तुम्हारी याद साथ मिठास थी
पढ़ना उस कविता की पंक्तियाँ
जिसमें तेज़ मुसाफ़िर की तरह
की यात्रा मैंने।

4

हर जगह कुछ गुंजाइश तो ज़रूर होगी
एक और आदमी के बैठने की जगह-भर
घर में ख़ाली किया जा सकता होगा सामान,
एक मेहमान-भर भूख बचायी जा सकती थी
एक कविता-भर और ज़िन्दगी रही होगी
सभी के हिस्से में
हर कहानी में
छूट जाता होगा एक किरदार
सब पूरा-पूरा कहाँ
एक की गुंजाइश तो हर जगह ही बच रहती होगी
हर गिनती के बाद अगली गिनती की निश्चितता जितनी।

5

खौलना था इस बात पर ख़ून
नहीं खौला
और दिमाग़ ने मोल-भाव करना शुरू कर दिया
जहाँ ग़ुस्सा आना था
वहाँ समझदारी पहले से मौजूद मिली।

जबरन मुस्कराना कम मुश्किल लगा
और मैंने बूढ़ा होना शुरू किया आज।

6

हाँ, वह मैं ही था
जिससे सबसे ज़्यादा बातें कीं
मैंने कॉलेज के दिनों में,
सबसे ज़्यादा घूमा ख़ुद के साथ
ख़ुद को सबसे ज़्यादा दिलासा दिया
ख़ुद के साथ रोया सबसे ज़्यादा
प्रेमिका के ग़ुस्से में ख़ुद के सबसे ज़्यादा पास रहा
जब भी सच कड़वा लगा तो
ख़ुद से ही कहे सबसे ज़्यादा झूठ।

7

सर्द दोपहरों में धूप से ज़्यादा सुंदर
क्या हो सकता है
सूरज के इंतज़ार से ज़्यादा तीखा
क्या हो सकता है भला
खिड़की से पढ़ने की मेज़ पर पड़ता हुआ
धूप का गोला
जिसे खाया तो नहीं जा सकता
लेकिन देखकर बहुत सुख मिलता है।

सहूलियत ने क्या-क्या सिखा दिया
क्या यह भी सोचने का था कभी
कि कविता होगी धूप और सर्दी
के बारे में।

शिवांगी की कविता 'छत और लड़कियाँ'

किताब सुझाव:

सारुल बागला
जन्म: 08/07/1995, महोली सीतापुर, उत्तरप्रदेश। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और IIT(ISM), धनबाद से पढ़ाई-लिखाई। कुछेक कविताएँ कुछेक जगहों पर प्रकाशित हैं। कविताएँ लिखना मेरे लिए ज़रूरी है क्यूँकि भीतर घुटन बहुत बढ़ जाती है तो सिर्फ़ यही एक तरीक़ा आता है मुझे अभिव्यक्त करने का। बाक़ी अच्छी चीज़ें पढ़ना पसंद है। ईमेल: sarulbagla.bhu@gmail.com