मन का घर

उसके मन के घर में
गूँजती रहती हैं
टूटती इच्छाओं की
मौन आवाज़ें
उसमें हर बालिश्त
दर्ज होती जाती है
छूटते जा रहे सपनों से
पलायन की एक लम्बी फ़ेहरिस्त

क्षोभ के इस अतल सागर में
डूब जाने से, वो बचा लेना चाहती है
तैरने के लिए आतुर नयी लड़कियों को
वो नहीं सौंपना चाहती उन्हें
पारम्परिक दाँव-पेंचों की गुच्छा-भर सौगातें
आगाह करना चाहती है उन्हें
पाँव की हर चाप के आसपास
उगे हर काँटेनुमा वृक्ष
से

उनके शांत और मासूम चेहरों पर
मुस्कान सहेजकर
लगा देना चाहती है
हौसलों की मज़बूत साँकल
उनके मन के रिक्त कोनों को
भर देना चाहती है
अपनी बची हुई ऊष्मा से

निराशा से नम रातों की
उजली सुबहों में
उन्हें दिखाना चाहती है
शेफ़ालिका के मुस्कुराते नरम फूल
कि जिन्हें वो बाँच सकें
मन के पारदर्शी रोशनदानों से
वो फूँकना चाहती है उनके कानों में
चेतना से भरा कोई मंत्र
कि वो रच सकें नये अर्थ
हर शब्द के समीचीन
कि ख़ूबसूरती के मायावी भ्रम से निकलकर
गढ़ सकें सुन्दर-असुन्दर से परे की एक नूतन परिकल्पना

वो सीख सकें
प्रकृति की हर संरचना पर धौल जमा सकने का कौशल
ग़ैर बराबरी से भरे इस लिजलिजे समाज में
पाट सकें लकीर
हाशिये पर खड़ी लड़कियों के लिए

दिला सकें स्त्रियों को उनके हिस्से का प्रेम
जो शताब्दियों से आँसुओं के रूप में
जमा है उनकी आँखों में…

तुमसे विलग होकर

तुम्हारी याद के मुहाने पर आकर
अनेक परिदृश्य चलचित्र की तरह चलने लगते हैं
जिनसे अनायास ही एकांत में एकतरफ़ा सम्वाद करने लगती हूँ
तुमसे दूर जाना हर बार कितना अजीब होता है
और तभी मैं तुम्हारा होना जान पाती हूँ
तुमसे विलग होकर मैं मात्र देह में बदल जाती हूँ
इस अकेली पहाड़ी शाम के धूसर रँगों में तुम्हारे साँवले सौंदर्य का बिम्ब उभरने लगता है
बुरांश के चटकीले फूलों में तलाशने लगती हूँ तुम्हारे प्रेम के माने
ग्लेशियर की पिघलती बर्फ़ से फूटते सोतों का निनाद अंतिम हूक तक सुनती हूँ
प्रेम की आतताई बेला में सोचती हूँ कि सभ्यता के किस हिस्से के कितने योजन को पार कर हम मिले होंगे

देह नहीं, मन की प्रदीप्ति को बाँचने की कला में प्रवीण हो तुम
तुम अक्सर माप लेते हो अपने प्रेम के तराजू में मेरा भारी होता मन
तुम्हारे रोशन चेहरे में देख लेती हूँ मैं चंद्रमा की आठों कलाएँ
और हम पकड़ लेते हैं एक-दूसरे की आँखों में उदासियों के तरल बिंदु
तुम्हारे बग़ैर मैं बिल्कुल ख़ामोश हो जाती हूँ
स्मृतियों की भित्तियों में बिलख उठती हूँ मेरे प्रियतम
तो
अब समझ लेना चाहिए कि इस धरती पर अभी भी प्रेम के प्रस्फुटन के गीत गाए जा सकते हैं
इससे पहले कि कोई अवसादी चट्टान विछोह का ज्वालामुखी बन लावा-सी फूट पड़े
और विस्थापित कर दे किसी रची बसी सभ्यता की जड़ों को
हम लौट आएँ एक-दूसरे के पास
कि ये पृथ्वी बची रहे हमारे प्रेम की आधारशिला से
हमारे प्रेम की लयबद्ध प्रतिबद्धता जीवित रखेगी प्रेम के पक्ष में गाए जाने वाले यशोगान
रात्रि के किन्ही एकांत पलों में चेतना के उजास में
स्वप्नों को बोने के क्रम में
हम भविष्य के प्रतिगामी सुखद संसार का प्रतीक बन जाएँ
गर हमारे प्रेम में आसक्त हो
ऋतुएँ अपनी लय में परवर्तित होती रहें
धरती सूर्य के चारों ओर सिंदूरी आभा लिए फेरे लेती रहे
तो समझो प्रिय कि हमारा प्रेम प्रतीक है जीवन का!

शालिनी सिंह की कविता ‘स्त्रियों के हिस्से का सुख’

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