दुनिया लौट आएगी

निःशब्दता के क्षणों ने
डुबा दिया है महादेश को
एक गहरी आशंका में

जहाँ वीरान हो चुकी सड़कों पर
सन्नाटा बुन रहा है एक भयावह परिवेश
एक अदृश्य शत्रु ने
पसार दिए हैं अपने ख़ूनी पंजे

सिहर उठी है सम्वेदना
ठिठक गयी हैं अभिव्यक्तियाँ
शब्दों ने जैसे अपना लिया है मौन
भावनाएँ जैसे जम गयी हैं
हृदय के किसी कोने में बर्फ़ के मानिन्द

संक्रमण के ख़तरनाक दौर में
जहाँ सुरक्षित नहीं हैं हम
लेकिन भविष्य की पीढ़ी को
सुरक्षित देखना चाहती हैं
हमारी आशान्वित आँखें

हमारे भविष्य की आँखें
टकटकी लगाए देख रही हैं
आशाओं के अथाह समुद्र में
उनकी स्पन्दित साँसों के साथ
अब समय ठहर गया है

और ठहर गयी है मनुष्यों की रफ़्तार
दुनिया धीरे-धीरे
तब्दील हो रही है
एक अव्यक्त भय में

कि दुनिया लौट आएगी
जल्द अपने रास्ते पर
अभी हवाओं में कुछ ज़हर ज्यादा है…

मज़दूर होना ही उनका दुर्भाग्य था

वे चल रहे थे रात और दिन
मील नहीं, हज़ारों किलोमीटर पैदल
उनके कंधों पर उनके छोटे बच्चे थे
और रास्ते में भूख शान्त करने के लिए कुछ सामान

वे लौट रहे थे राजधानी से गाँव की ओर
संक्रमण ने निगल लिया था उनका रोज़गार
भूख पाँव पसार रही थी बहुत तेज़ी से
सरकारें नहीं रोक पा रही थीं उनका पलायन

वे आजीवन सींचते रहे अपने रक्त से
महानगरों की असुन्दर देह
संक्रमण के विस्फोटक समय में
वे छोड़ देना चाहते थे शहरी सभ्यता
जहाँ मानवता की कलगियाँ सूख रही थीं
और दरक रहे थे सम्वेदना के दरख़्त

भूख और जिजीविषा की जद्दोजहद में
वे चल रहे थे लगातार अपने अन्तिम गन्तव्य तक
छा गया था उनकी आँखों में अन्धेरा
रोशनी की धूमिल उम्मीद के अहसास में
उनके क़दम शहर-दर-शहर पार करते रहे

रात के सघन अन्धकार में
उनके पदचाप छोड़ रहे थे अमिट निशान
चलते-चलते जब वे थक गए
तब हाइवे के फ़ुटपाथ बन गए उनके लिए बिछौने

महादेश के घोषित लॉक डाउन में
अपने जीवन को बचाये रखने के लिए
उनका चलना ही आख़िरी विकल्प था
दर-दर भटकने को स्वीकार न करके
वे चल दिए अपने-अपने गाँव
रेल की पटरियाँ उनके लिए बन गए रास्ते
लाखों मज़दूर इन पटरियों के रास्ते
सकुशल पहुँच गए अपने घर
किन्तु कुछ के हिस्से में पटरियाँ बन गयीं
उनका अन्तिम रास्ता
वे नहीं देख पाए अपने गाँव
और नहीं देख सके अपने हिस्से की बिखरी रोटियाँ

विश्व की ‘पांच ट्रिलियन’ अर्थव्यवस्था को सहेजे
इस महादेश में
मज़दूर होना ही उनका दुर्भाग्य था
और दुर्भाग्य था उनका
नंगे पाँव अपने घर पहुँचना..

तब तुम्हें कैसा लगेगा

चार बाई छः की खोली में
रहने को दिया जाए तुम्हें
और दिनभर कराया जाए काम
सोने को दी जाए
केवल दो गज़ ज़मीन
देश की घोषित तालाबन्दी में
जब चला जाए रोज़गार
और ख़ाली हों राशन के कनस्तर
चूल्हा भी बुझ चुका हो
बच्चे बिलबिला रहे हों भूख से
और पढ़ाया जाए
उसी समय आत्मनिर्भरता का पाठ
तब तुम्हें कैसा लगेगा?

तपती दोपहर में
तुम्हें सड़कों पर
चलाया जाए पैदल
कंधे पर रखाया जाए समान
और परिवार सहित
भूखे पेट चलाया जाए
तब तुम्हें कैसा लगेगा?

संक्रमण के ख़तरे के बनिस्बत
पेट पर भूख के संक्रमण को भाँपते
जब तुम लौट रहे होते अपने गाँव
और लौटते समय बीच चौराहे पर
पुलिस द्वारा पीट-पीटकर
कराया जाए अधमरा
तब तुम्हें कैसा लगेगा?

रेल की पटरियों पर
तुम्हारे भाई चलते-चलते
थककर सो जाएँ
और रात के अन्धेरे में ट्रेन
उनके चिथड़े उड़ा दे
तब तुम्हें कैसा लगेगा?

तुम्हारी गर्भवती बहन बेटियों को
सड़कों पर चलने के लिए
किया जाए अभिशप्त
और वे चलते-चलते प्रसव से कराह उठें
तब तुम्हें कैसा लगेगा?

श्रमिक ट्रेन से
तुम्हें भेजा जाए अपने घर
और ट्रेन रास्ता भटक जाए
एक दिन की यात्रा सात दिन में
करायी जाए पूरी
और रास्ते भर तुम्हें भूखा-प्यासा रखा जाए
तब तुम्हें कैसा लगेगा?!

Book by Shiv Kushwaha: