रोटी की गुणवत्ता

जिस गाय को अम्मा
खिलाती रहीं रोटियाँ
और उसका माथा छूकर
माँगती रहीं स्वर्ग में जगह
अब घर के सामने आकर
रम्भियाती रहती है
अम्मा ने तो खटिया पकड़ ली है
अब गाय को ऊपर से ही
डाल देती हैं रोटी
बहुएँ

रोटी तीसरे माले से फेंकी जाती है
फट्ट की आवाज़ से
सड़क पर गिरती है
गैया ऊपर देखती है
तो कोई नहीं दिखता
गैया को लगता है
अम्मा स्वर्ग को चली गईं
और अम्मा ही फेंक रही हैं
रोटियाँ स्वर्ग से

पहले अम्मा जो रोटियाँ देती रहीं
एकदम सूखी
मुँह में धरते ही चटर-चटर होतीं
यह रोटी तो
एकदम मुलायम
लेकिन बस एक ही
अम्मा चार रोटियाँ देती थीं

एक रोटी फेंक दिए जाने पर भी
गाय उसे खाना शुरू नहीं करती
वह ऊपर देखती रहती है
दूसरी, तीसरी और चौथी रोटी की बाट जोहती

गाय को लगता है
स्वर्ग में अम्मा के दाँत
और पाचन दोनों सही हो गया है
अम्मा उसके हिस्से की रोटियाँ भी
खा ले रही हैं
ख़ैर! रोटी भी तो कितनी मुलायम है
नियत बिगड़ गयी होगी बुढ़िया की

ऊपर देखते-देखते
जब गाय की गर्दन दुखने लगती है
तो वह नीचे पड़ी
मुलायम रोटी
बेमन से चबाने लगती है

भूखी गाय को रोटी की गुणवत्ता से
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है
भूखी गाय को तो कम से कम
चार रोटियाँ चाहिए

चाहे स्वर्ग से गिरें
चाहे तीसरे माले से!

ट्रैफ़िक जाम में फँसी एम्बुलेंस

ट्रैफ़िक जाम में फँसी
लगातार आवाज़ करती एम्बुलेंस

जिसको मैंने देखा
तुमने देखा
जाम में फँसे हर आदमी ने देखा

सबने चाहा कि
उसमें पंख लग जाएँ
और वह उड़कर पहुँच जाए
अस्पताल

पर ऐसा न हो सकता था
बेकसी में चिल्लाती रही एम्बुलेंस

और फिर एकदम
तुम्हारी, मेरी और हम सब की
गाड़ी की सीट
जैसे हो गयी
असहायता का एक शिखर

जहाँ हाथ पर हाथ धरे बैठे
हम सब लोग
जितनी भी बार देखते
उस एम्बुलेंस को
दिल में धक्क-सा हो जाता

जैसे हमारी
एक धड़कन
जाकर लग जाती हो
हर बार
एम्बुलेंस में मृत्यु से लड़ते
उस मूर्छित मरीज़ को।

सन्नाटों के दाँत

रातों में आने वाली आवाज़
जिसे बचपन में
मैं झींगुर की आवाज़
समझता था
अब लगता है कि
वो सन्नाटे की आवाज़ है
सन्नाटे के दाँत पैने करने की आवाज़

वही सन्नाटा
जो मुझे बत्ती करने पर
खाने को दौड़ेगा।

आभास

तुम्हारे आसपास होने का आभास
हमेशा मेरे आसपास रहता है

वह लम्बे अन्तरालों में लेता है साँस

उसके साँस लेने से
फूलता और सिकुड़ता है मेरा घर

मैं कौतूहल में देखता हूँ
इधर-उधर

मेरे घर के तीन कमरों का ख़ालीपन
बन गया है
तुम्हारे आसपास होने के आभास
का फेफड़ा।

गोलेन्द्र पटेल की कविताएँ

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