Poems : Shivani Shantiniketan

वो सूखा गुलाब

डायरी में रखा
वो सूखा लाल गुलाब
आज भी
तुम्हारी मोहब्बत को
बयाँ कर रहा है
तुम्हारे अहसासों की रवानी
मेरे लहू में तैर रही है
माना कि हम दूर हैं
हालातों से मजबूर हैं
पर तुम्हारे ख़यालों से
मेरे विचार बनते हैं
जिनमें उलझ जाती हूँ मैं
फिर से सुलझने के लिए
अक्सर ही गुनगुना लेती हूँ
उन हसीन लम्हों को
संग जो गुज़ारे थे
जो कभी बस हमारे थे
कॉलेज की कैंटीन में
कच्चे गलियारों में
पेड़ों की छाँव में
छत की मुण्डेर पर…

मासूम लड़की

गर्मी के उमस भरे दिनों में
ट्रेन के जनरल कोच की
भीड़ में बैठी
वो पसीने की बूँदों को
पोछती एक
लड़की
कितनी मासूम और
निश्छल लग रही है,
कह रही है अपनी
सहेली से
कि आज तो पहुँचना
ज़रूरी है
अपने गंतव्य पर
जहाँ इंतज़ार
किये बैठा उसका
प्राणप्रिय।
पर लोगों की
लालची नज़रें
उसके बदन को
भेदती गुज़र रही हैं
असहज मसहूस
कर रही है
वो उस पल
पर फिर भी बेफ़िक्र
होकर डूबी है
उन ख़यालों में
जहाँ होगा हमदम का साथ
भूल जाएगी हर वो बात
जो उसे महसूस होती
अपने आशियाँ से बाहर निकलते ही…