Poems: Shraddha Arha [Selected by Rajendra Detha]

क्षितिज का मोह

हर पल रद्दी में तब्दील होते हैं
अनछुए अख़बार
ये जानते हुए भी कि
अकेलापन जस का तस है।

दमकती रोशनी वाले एलईडी में चिल्लाते गाते लोग
हर पल चैनल बदलते हाथ
कोई बटन क्यों नहीं नीरसता को बदलने वाला?

न जाने किस ख़ुशी या कौन-से ग़म में रो रहा है आसमान? ये ख़याल कहाँ से आता है मन में?
कौन-सा सैलाब छिपा है जीवन में?

कहाँ पहुँचना चाहते हैं दौड़ते-भागते लोग?
क्या पा गए हैं वे चाहतों की टोह?
या शायद हमें है क्षितिज का मोह।

भरी अलमारियाँ, थके लोग, योग की चाह में पाते वियोग
मुस्कान को तरसते लिए दिल में सोग
दिन-दिन बढ़ता ही जाता है ये रोग

बाग़ में खिलखिलाती औरतों की ख़ुशी का संचार
मुझ तक क्यों नहीं होता? राह कौन-सी टटोलूँ,
किस समंदर में लगाऊँ गोता?
कहाँ खो गया है बच्चा, जो था हँसता, गाता, रोता।

कुटा अदरक, पिसी मिर्ची, कटी सब्ज़ियाँ,
उबले आलु ही देते हैं स्वाद।
क्यों काले अक्षरों में छिपी है सफ़ेद रोशनी
कहाँ है रस भरी चाशनी?

प्रेम से पहले क्यों नहीं मिलती वैधानिक चेतावनी?
कि नाकामी बना देगी नाकारा
आख़िर हर मिलन का सपना किसका होता है साकार
हर प्रतिरूप को कब पाता है आकार

जीवन ऊर्जा को पानी पिलाने वाला घड़ा रिक्त है
दिल बहलाने के सारे अच्छे ख़याल फ़ानी हैं
मनबहलाव तो लफ़्ज़ ही बेमानी है

कितना कम खटखटाती है आशा मन का द्वार

आख़िर इस दौर को कमी क्या है?

हिचकियों की दौड़ती नब्ज़

ठहराव के तल तक झाँकती हूँ कि
कुछ ही ख़्वाहिशों की नब्ज़ चल रही है अभी भी
कि ज़िन्दगी की जल रही लकड़ी से
जल सके चुल्हा किसी घर में तो पायमल हो
उम्र की डायरी के बचे पन्ने।

आधी उम्र गुज़ार चला गुल
हवाओं की महक और बढ़ा ले थोड़ी
मुस्कुराता है इसी आस में

हिचकियों की दौड़ती नब्ज़
देती है दो घूँट दिलासे के
और पतझड़ों के मौसम
का ख़ौफ़ दूर होता है दिल से

क़हक़हों के दिनों की
याद भरी दोपहरें
सवाँर जाती है
होंठों की सलवटें

पास ही के दरख़्त पर
घोंसला बुनती ‘टेलरबर्ड’
गाती नहीं शोक गीत
पाले बच्चों के कुछ दिनों में उड़ जाने का

बरसते बादल भी तो नहीं जानते
फिर कितना आब लौट पाएगा
बरसने के बाद

और अतीत के खण्डहरों के
बीच तनकर खड़ी एक मिनार
कितना साहस देती है
थके हारे समय को ठेलने का

सड़क के किनारे चलते काँपते पाँव
खो चुकी हमसफ़र की
तस्वीर को देख करते हैं परिहास
और नम हो जाती हैं कोरें आँख की।

कितना कुछ समेटकर भी
रह जाता है कितना कुछ शेष
फिर भी न जाने कौन-से भार से
बोझिल हुई जाती है पलकें।

आकण्ठ डूब

बाँहों में निढाल हो
हिचकियों में डूब
जी भर रो लेने का सुख
ढूँढता रहता है भरा कण्ठ कई बार

कि वैश्वीकरण के दौर में
नितांत अकेले पड़ जाना
बहुधा बहुत सालता है।

शब्दों के मापदण्ड

कितने दुर्बल वाहक हैं शब्द
भावानुभूतियों को नहीं ढो पाते ढंग से

सम्वेदन में जितना आता है,
शब्दों में
उससे बहुत न्यून कहा जाता है

इसलिए कभी गायन
कभी नर्तन
कभी हास्य
कभी रुदन
और कभी मुखरता
बात कहती है,
शेष
फिर भी अनकही मौन रहती है

इसलिए कहती हूँ
शब्द ही न समझना
उस अनकहे पर भी ग़ौर करना
जो शब्द-दूत पहुँचाते ही नहीं।
वाणी के बँधन में समाते ही नहीं।

निराकार

ज्ञात रहे!
अरूप
निराकार
को उतारने के लिए
पात्र हृदय का रिक्त चाहिए।

या कि वो हो जाता है रिक्त
जब बचता नहीं ‘उसके’ सिवा कुछ भी अतिरिक्त
उस वक़्त जब ‘वो’ उतरेगा उसमें।

क्षण वो नियत न होगा
वो परिस्थिति होगी।
उस वक़्त मैं मैं न रहूँगी
या कि मैं रहूँगी ही नहीं
सम्भव है कि बह रहे हों आँसू
भर जाए प्रकाश चहुँओर
पुलक जाए रोमावली
हो जाए रोमांच।
नैत्र हो जाए उदग्र
उस वक़्त न डरना है, न लौटना है
न चेष्टा करनी है विरत होने की।

ऐसे ही हाल में कृष्ण कह देते हैं
सब धर्म तज मेरी शरण आ जाओ!

उस समय गुफा में बैठे मोहम्मद गा देते हैं आयतें।

उपनिषद् का ऋषि कह उठता
अहं ब्रह्मास्मि!

सिद्धार्थ बन जाते हैं बुद्ध
वर्धमान महावीर।

लेकिन ऐसा चमत्कार तभी घटेगा
जब चित्त, मन, बुद्धि से शरीर परे
हटेगा।

यह भी पढ़ें: अपर्णा देवल की कविता ‘बेचारे पुरुष’

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