अख़बार

दरवाज़ा खोलने से पहले ही
रेंगकर घुसती है अंदर
सुराख़ में से
बाहर दुबके अख़बार पर बिछी
ख़ून की बू

अख़बार वाला छोड़ जाता है आजकल
मेरे दरवाज़े पर
साढ़े चार रुपये में
बीस-बाइस लीटर ख़ून

मैं गटकता हूँ
चाय की चुस्की के साथ
हत्याओं की ख़बरें
और ख़ुद से कहता हूँ
चाय कड़क नहीं है
दूसरा ब्रांड चाहिए

हमें दूसरा नाम चाहिए
‘मॉब लिंचिंग’
हमारी चाय में घुलकर
फीका हो गया है।

सूरजमुखी मज़दूर

उगते सूरज की पुकार पर
फिर से एक बार
सूरजमुखी खिल जाते हैं

बग़ल ही की इमारत में
सर पर पीली टोपी पहने
मज़दूर काम पर आते हैं

तपते चलते हैं सूरज में होकर चूर
पीले सूरजमुखी
और पीली टोपी वाले मज़दूर

मज़दूर सूरज को
सुलगा लेते हैं
अपनी-अपनी बीड़ियों पर
आग जो छू ले होंठ को तो
ग़ुस्सा लेते हैं
अपनी-अपनी बीवियों पर

उनकी बीवियाँ घर आती हैं
अपने दिन और शाम को
चूल्हे में झोंक
उनके लिए रात पकाती हैं

पीली लैम्पपोस्ट की रोशनी में
खो जाते हैं
सो जाते हैं बदस्तूर
पीले सूरजमुखी
और पीली टोपी वाले, थके मज़दूर

उगते सूरज की पुकार पर
अगले दिन फिर एक बार
मज़दूर
मुरझा जाते हैं।

कन्वीनिएंट विज्ञान

कि भूल जाती हैं किरणें
रेफ़्लेक्ट होना
एक अपारदर्शी वस्तु से,
या इग्नोरेंस और उदासी का पहाड़
खड़ा होता है हमारे बीच
माध्यम बन रिफ़्रैक्शन का?
किरणें भटकती हैं
और मुझे दिखते हैं बस
उसके पीछे खिले सूरजमुखी

कि विफल हो जाते हैं
विज्ञान के सारे नियम
जब फुटपाथ पर
एक बच्ची हाथ फैलाती है!

औरत का अतीत

पोती के बालों को
चोटी में बुनते हुए
वो टाँक देती है उनमें
‘सा’, ‘रे’, ‘नि सा’
के संग पूरी सरगम
जिसे ससुराल की चौखट पर आते ही
कलश में भर
ठोकर मार दी थी

झाड़ती है चादर
तो फिसलते हैं
और गिर जाते हैं फ़र्श पर
मुँह के बल
धड़ाम से
सिलवटों में उग रहे
मुट्ठी-भर मिसरे

पति का शॉल निकलते वक़्त
मिलते हैं उसे
तहों के बीच
सलीक़े से पड़े
हारमोनियम की धौंकनी में फँसे अलंकार
और बाँसुरी में फूँकी आख़िरी साँस

वो आईने में देखती है
कि पायलें— उनकी छनक
चेहरा— उसकी चमक
गुल— उनकी ख़ुशबू
ख़त— उनकी आरज़ू
उसकी झुर्रियों में जमकर
काई बन चुके हैं
कि मुस्कानों की गवाहियों
किताबों, क़लमों, स्याहियों
घुँघरुओं, पैरों की थिरकनों
कविताओं, गीतों, सरगमों
को साथ लिए
काला रंग
उसके बालों से उतरकर
पहरा दे रहा है
उसकी आँखों के नीचे तैनात घेरों में
उसकी आँखें
सूखा तालाब हो गयी हैं
जिसमें वो तड़प रही है
अकेली मछली की तरह

औरत का अतीत
एक पूरी सभ्यता है,
बच्चों के ब्याह के बाद
वो ढूँढती रहती है
उस सभ्यता के बचे-खुचे अवशेष!

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