Poems: Shyam Chandele

भूलने का मौसम

भूलने के लिए भी
चाहिए एक मौसम
जैसे
याद करने के लिए
होता है वसन्त।

पुनरावृत्ति

काश
सच की पुनरावृत्ति होती
पर
होती है झूठ की,
उस झूठ की जब
उसने कहा था
मुझे तुमसे प्यार है।

पलायन

सारी दुनियावी बातों से इतर
मैं इस पृथ्वी का एक प्राणी मात्र हूँ
और बुद्धिमान तो क़तई नहीं,
होता तो
दुनिया से
स्वार्थ पलायन कर गया होता
और
हथियारों की आवश्यकता नहीं होती।

रेल की पटरी

नेपथ्य में गूँजती
रेल की आवाज़
बैचेन करती है
सोचने पटरी की दशा

कितनी बार गुज़रती है रेल
कितनी बार काँपती है पटरी
कितनी बार धड़धड़ाता है
दिल पटरी का

कितनी बार कुचल
दी जाती हैं भावनाएँ
कितनी बार हो जाती हैं आहत
पर हमेशा रहती हैं बनी स्थितप्रज्ञ

मनुष्य की दशा भी ऐसी ही है
जब भी हरा सिग्नल होता है
इच्छाओं के दमन का,
काँप जाता है मन
पर सह जाता है
चोट ऊपर के आदेश की।

मेरी भाषा

मैं अपनी ही भाषा का कवि हूँ
अपनी ही भाषा में लिखता हूँ
हँसी-ख़ुशी, मुस्कुराना-गुनगुनाना,
दुःख भी अपनी ही भाषा में
करता हूँ प्रकट,
अपनी ही भाषा में
करता हूँ सम्वाद,
मेरी भाषा है प्रेम।