सुना तुम मर गए, गई रात

कोई सुबह है
किसी भी सुबह की तरह
वासंती सन्नाटा
गहरा है
और अचानक कोयल बोली
प्राणों को बेधती हुई
कलेजे में उठी हूक की तरह,
मैंने सुना तुम मर गए
गई रात
मुझे क्या फ़र्क़ पड़ता है
कि तुम दुनिया में सबसे सुंदर थे
या सबसे ज़हीन
या सबसे अमीर
या थे बेतहाशा कुरूप
और जाहिल
आख़िर मैं भी तो मरूँगा
ठीक तुम्हारी तरह
एक दिन, वैसी ही पीड़ा से,
क्या फ़र्क़ पड़ता है?

पर क्या तुम कभी बोले थे
उस कोयल की तरह
प्रेम की कौंधती आकुल याचना में?
या बहुत ज़ोर से आती रुलाई को
दबाने वाली सिसकी की तरह?
या गुनगुनाया था कोई गीत एकांत में फैली
पारिजात की नामालूम
सुगंध की तरह?

अगर हाँ,
तो उससे फ़र्क़ पड़ता है
मुझे
और मेरे चारों ओर फैली
पत्थर की तरह सख़्त होती दुनिया को!

भूलना यूँ होता है

भूलना यूँ होता है
जैसे पुराने मकान के
उस आरामदेह कोने को
बिल्कुल न पहचानना
जहाँ तुम बचपन में
किताबें पढ़ते थे
घंटों, घुसकर

भूलना यूँ भी होता है
कि गाँव के तालाब के
कीचड़ भरे किनारे पर झुके
मोटे पेड़ पर छायी पत्तियों की गंध,
बहुत कोशिश करने पर भी
याद न आए

और यूँ भी कि
पहचान ही न पाओ
उस कॉपरस्मिथ बार्बेट की आवाज़
शाम की चहचहाहट में,
जिसे तुम ख़ूब ढूँढते थे
हुमककर
गरमी की अमराइयों में

गुम चोटों की मार,
और बहुत से सूखे आँसू तो
यूँ भी घुल जाते हैं सुबह की हवा में

पर पिछली सर्दी के गुलाब,
सिर्फ़ तुम्हारे लिए ही गाए गए गीत,
और तुम्हारे सामने ही
एक घायल कबूतर को
खाने के लिए
पकड़कर ले जाते
बहेलिए की हिंसक आँखों का रंग
याद न आना…

क्या भूलना ऐसा होता है?

सूखे पेड़ों की कविता

नीले आकाश के नीचे
खड़े सूखे पेड़ों में
मुझे एक कविता दिखती है
सैकड़ों बाँहों से थामते हुए
नरम पत्तियों और रंगीन फूलों को
उनके हाथ अब हो चले है कृशकाय,
बदरंग, बस टूटने को हैं
सूख ही गए हैं बिल्कुल
तिनकों-तिनकों से बने कुछ घोंसले
ज़रा से अरझे हुए हैं,
कुछ मज़बूत और कुछ पतली शाखों के बीच
कोई छोटे-छोटे परिवार थे यहाँ
छोटी चिड़ियों के
अब उड़ गए हैं

इन्हीं सूखी डालों और तिनकों से लिखी है एक कविता
कुछ-कुछ रीत गए, छीज गए पेड़ों ने
तुम भी पढ़ सकते हो इसे
बस पलटकर देखो ग़ौर से
धूल भरी गर्म सड़कों पर
ठेले खींचते सफ़ेद मूँछों वाले बूढ़े को
ज़मीन पर बैठ
सब्ज़ी बेचती सूखकर काली हुई
कोचनिन को

अपनी माँ के झुर्री भरे दोनों सूखे हाथों को!

Book by Siddharth Bajpai:

Previous articleउसकी माँ
Next articleवरमाला रौंद दूँगी
सिद्धार्थ बाजपेयी
हिंदी और अंग्रेजी की हर तरह की किताबों का शौकीन, एक किताब " पेपर बोट राइड" अंग्रेजी में प्रकाशित, कुछ कविताएं कादम्बिनी, वागर्थ, सदानीराऔर समकालीन भारतीय साहित्य में प्रकाशित. भारतीय स्टेट बैंक से उप महाप्रबंधक पद से सेवा निवृत्ति के पश्चात कुछ समय राष्ट्रीय बैंक प्रबंध संस्थान, पुणे में अध्यापन.सम्प्रति 'लोटस ईटर '.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here