कमाल का स्वप्न

जीवन के विषय में पूछे जाने पर
दृढ़ता से कह सकता हूँ मैं

कमाल का स्वप्न था..

जैसा देखा, हुआ नहीं
जैसा हुआ, देखा नहीं!

नींद

कहानी सुनाकर
दादी कहती थीं—
“कहानी गई, बन में
सोचो अपने मन में!”
और सुलाते हुए—
“निंदिया आजा निंदर बन से!”

ठीक तब,
मैं समझ नहीं पाता था,
बन में जाती है, कहानी
नींद भी बन से ही आती है!
ऐसा क्यों?
बन में कुछ है क्या?

आज, कुछ रातें जाग चुका होने पर
मैंने जाना,
बन में जाती है, कहानी
और वापस आती है,
बनकर, नींद!

तुम्हारी नींद एक कहानी है
जिसे सुनने, ईश्वर
स्वप्न बनकर आता है

कहानी पूर्ण होते ही,
टूट जाता है, स्वप्न,
सो चुका होता है ईश्वर

और,
जाग चुके होते हो तुम!

(स्मरण हो आ रहा है,
मेरे ईश्वर ने बहुत दिनों से कोई कहानी नहीं सुनी!)

प्रतीक्षारत

झर जाने पर
सभी पत्ते

उग आती है
‘प्रतीक्षा’
डालियों के साथ-साथ
जड़ों पर भी

नहीं होने देती ठूँठ
कभी
पेड़ को

तुम प्रतीक्षारत हो,
ठूँठ नहीं!

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