1

इस नीरवता में
जैसे खींची गई लकीर के दोनों ओर
मैं खड़ा हूँ एक खाई की तरह,
मेरे बीचों बीच कोई फ़्रंटियर है
जिससे मैं अछूता हूँ
जैसे अब तक तुमसे

इस नीरवता में
मेरी गिनती शुरू होती है उस विपल से
जो एक क्षण का साठवाँ भाग है,
किसी बाढ़ की तरह बह गई यह पूरी दुनिया
मेरे मन से,
यह धरा तुम्हारे अधस्पद है
आओ नाप लो मुझे पादान्त से!

इस नीरवता में
मृत्यु भी अपना आकर्षण खो बैठी
कि तुम में कहीं अधिक मुक्ति देखी है मैंने
और यह भी कि
कितना बनैला हो सकता है प्रणय
जब चाहते हुए तुम्हें
मैंने हर लेने चाहे तुम्हारे प्राण भी

इस नीरवता में
मेरे कंठ से जो तुमने छीन ली है मेरी वाणी
मैं अब स्पष्ट सुनता हूँ अपनी आवाज़
अनुभूतियों के प्रवाह में तिरता हूँ
तिरते हूए तोड़ता हूँ
प्रमथा के श्वेत पुष्प
अंधकार के एक लग्गे से!

2

सौंदर्य की सिद्धि क्या इसमें नहीं कि
मैं तुम्हारी कुरूपता ढूँढते हुए हताश हूँ!

ऐसी अरुद्ध शुभ्रता किसमें होती है
इतना बेदाग़ कौन होता है

मैं जो रात में जीता हूँ
जीने के पतीले को माँजता हूँ
एक चुटकी उजास से
किंतु मैं रोशनी की परवशता में
श्वास नहीं ले सकता
इसलिए तुम्हारी ओर देखते हूए
मैं बेदम ढूँढता हूँ अंधेरे की कोई शहतीर
और बार-बार आश्चर्य से
ठिठक जाता हूँ वहाँ…

जैसे उस जगह कई दुःखों की अंतिम छाया पड़ी है
एक सुख को गढ़ते,
जैसे मेरी समूची रिक्तता
वहाँ अपना अवसान देखती है,
भटकती हुई प्रेरणा अपना अंतिम पड़ाव

वहाँ तुम्हारे कपोल के तिल पर!

3

कितनी कहानियाँ फूँक दी गईं
हिन्दू-मुस्लिम फ़सादों में,
कविताओं की आबरू लूटी गई
जैसा औरत का हश्र होता है
कितने ही अधूरे वाक्यांशों में,
कोई बच्चा ढूँढ रहा है अपने पिता को गली-गली,
क़िस्सों में कितनी जगह
आदमी की आत्मीयता का मुँह दबाकर
चाक़ू मारा गया है पेट में

इसलिए देह, पसीना और उच्छवास
नहीं भूलते हिंसा
कि मनुष्यता की ओर बढ़ता आदमी
अपनी जड़ता वहीं छोड़ आता है

मैं भी लौटकर
भर गया हूँ भ्रांति से,
विचारों की अराजकता में
भटक रहा हूँ
भाग रहा हूँ शब्दों की हिंसक भीड़ से
कि तुम्हारी याद को बचा लूँ
भाग रहा हूँ इस भय से कि
जाने मेरी क़लम का मज़हब क्या है?
भागते हुए देख रहा हूँ कि
भाषा का चर्म उघड़ रहा है
सम्बोधनों में दुर्गंध है
व्याख्यानों में मवाद…
अर्थ रक्तसिक्त!