Poems: Vishal Singh

तीसरी प्रवृति

पुरुषों को मिले
प्रवत्तियों के
दो विकल्प
राम-सी अथवा
रावण-सी
नियति ने मेरे लिए
एक तीसरी प्रवृत्ति निर्धारित कर रखी थी
सीता-सी
मैंने चुने स्वयं के लिये श्राप
मैंने ठुकरा दिया
ऐश्वर्य भरा जीवन जीने का अवसर,

मेरा स्वामी, मेरा चित्त
जब लेखन में रहता था
तो मेरा जीवन भी
वनवास-सा कटना था!

मैंने लाँघ दी
समाज की अपेक्षाओं की
लक्ष्मण रेखा
मेरे चित्त को असहाय पाकर,
जो असहाय ना था
छलिया था

मेरे जीवन में
राम और रावण
दोनों का किरदार
मेरे चित्त ने निभाया
जिसका साथ देकर मुझे वनवास मिला
जिसकी सहायता करने के लिये
मैंने लक्ष्मण रेखा लाँघ दी

मुझपर उँगली उठाने वाला
एक भी व्यक्ति
ना मुझे जानता था,
ना जानना चाहता था

जब मेरे लिए
ऐश्वर्य के पट बंद हुए
सम्मान का आसरा मिला

मेरी स्वर्णिम प्रतिमा लगायी गई,
बातूनी!

जब ऐश्वर्य के पट
मेरे लिये पुन: खुले
मैंने स्वाभिमान के लिये
उसपर क़दम तक नहीं रखे
मेरी प्रवत्ति विद्रोही थी
मेरी प्रवत्ति, सीता-सी थी।

असत्याभास

दुनिया के कैनवस पर
अनुपस्थिति ने
उकेरा
अवहेलित वस्तुओं का
चित्र
नाम रखा
छाया

साक्ष्यों की
अनुपस्थिति से
सहस्त्र वर्षों का इतिहास
अर्धनग्न खड़ा है
कटघड़े में!

विचारों की
अनुपस्थिति से
विवश एक कवि
कविता लिख रहा है
अनुपस्थिति पर

यदि
अनुपस्थिति
उपस्थिति को
निगल जाए
तो
कितना सम्भव है
अनुपस्थिति का
उपस्थित होना?

सत्य यह है कि
यह प्रश्न साधारण है,
तथ्य यह है कि
इस प्रश्न का उत्तर
अनुपस्थित है।

शून्य : अनंत का छोर

स्वयं को शून्य कहना
संकेत है
निंदनीय आत्ममोह का
अथवा प्रतीक है
शून्य के वर्चस्व के प्रति अज्ञानता का!

ख़ुद को शून्य कहने वाले
होते हैं शून्य से बहुत अधिक छोटे
जिनकी गणना होनी चाहिये
नकारात्मक प्रणाली में

शून्य-गुरुत्वाकर्षण
के नाम से जाना जाता है
‘नगण्य गुरुत्वाकर्षण’

शून्य गुरुत्वाकर्षण का अस्तित्व,
निगल जाता अस्तित्व तक को!

मेरे लिए
शून्य से मिलता-जुलता
कुछ है
तो वह है
तुम्हारे-मेरे बीच की डोर..
डोर,
अथवा मृत प्रेम!

जिसे विभाजन के विचारों ने,
बनाकर रख दिया अपरिभाषित।

विद्रोह

प्रतिक्रयाएँ विद्रोह का लक्षण मात्र हैं,
आँख दिखाना, मुट्ठी मूँदना, दाँत पीसना
विद्रोह के लक्षण हैं,
विद्रोह नहीं!

किसी भीड़ का हिस्सा बनकर
आग ना मूतना
विद्रोह है!

किसी सहमी लड़की की
बेबसी पर चिपकी नौ गंदी नज़रों
को दस ना होने देना
विद्रोह है!

वृक्षारोपण पर लेख लिखना
विद्रोह नहीं है
मन मारकर फूल ना तोड़ना
विद्रोह है

काली प्रोफ़ाइल पिक्चर लगाना
विद्रोह नहीं है
किसी का फेंका कचरा
उस ही के सामने उठाना
विद्रोह है

विद्रोह चुनना
विद्रोह नहीं है
विद्रोह ना करना
विद्रोह है, विद्रोहियों से

इस विरोधाभासी कविता को पढ़कर
इस से असहमत होना विद्रोह नहीं है

इसे पढ़कर विद्रोह की परिभाषा याद करना
विद्रोह है…

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प्रशस्त विशाल
25 अप्रैल, 2000 को भोपाल (म.प्र.) में जन्मे प्रशस्त विशाल एक युवा उद्यमकर्ता, सिविल अभियांत्रिकी छात्र व लेखक हैं । ई-मेल पता : [email protected]

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