Poems: Yogesh Dhyani

तुम्हें पता है बुद्ध

तुम्हें पता है बुद्ध
तुम्हारे अनुयायियों के अलावा भी
तुम बहुतों के प्यारे हो

तुम विशाल होटलों के
मुख्य द्वारों से लेकर
मदिरालयों की दीवारों तक
अंकित हो गये हो

तुम कोठियों में हो
शोभागृहों में हो
विभिन्न मुद्राओं में

इस कलयुग में
तुम अपनी प्रतिमाओं के माध्यम से
हर उस जगह पर पहुँच गये हो
जहाँ से कूच कर गए थे
अपने समय में।

छलावे

कविताएँ और कुछ नहीं
छलावा होती हैं बस

अपने शरीर से
बाहर निकल आने की
अनुभूति के छलावे

वो, जो जानते हैं
बता सकते हैं
कि कितने सुंदर होते हैं
ये छलावे।

स्त्री-पुरुष

पुरुष और स्त्री
देह का
वर्गीकरण मात्र ही नहीं
मन की प्रकृति भी हैं

एक पुरुष मन भी
उतना ही होता है स्त्री
जितना होता है
एक स्त्री मन, पुरुष।

यह भी पढ़ें:

हरमन हेस की किताब ‘सिद्धार्थ’ से उद्धरण
निधि अग्रवाल की कविता ‘एक और बुद्ध’
अर्जुन डांगले की कहानी ‘बुद्ध ही मरा पड़ा है’
अनुराधा अनन्या की कविता ‘स्त्री-पुरुष समीकरण’

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