प्रस्तुत हैं वाणी प्रकाशन से प्रकाशित पूनम वासम के नये कविता संग्रह ‘मछलियाँ गायेंगी एक दिन पंडुमगीत’ से कुछ कविताएँ—

गमपुर के लोग

गमपुर को कोई नहीं जानता
और गमपुर भी किसी को नहीं जानता।

गमपुर के लोगों की प्यास नदिया बुझा देती है।
भूख जंगल का हरापन देखकर मिट जाता है।

जीने के लिए
इन्हें कुछ और चीज़ों की ज़रूरत ही नहीं।

गमपुर के लोगों को सूरज के चमकने और बुझने के विषय में कोई जानकारी नहीं।
इन्हें लगता है दुनिया इतनी ही बड़ी है
जितनी उनकी ज़रूरतें।

कभी-कभी लगता है
इनका नामकरण कोई सोची-समझी साज़िश तो नहीं!

न राशन-कार्ड
न आधार-कार्ड
न अक्षर-ज्ञान
उनके क़हक़हों के बीच पता नहीं कहाँ से आकर गिर पड़ती है मूक उदासियाँ!

ये लोग हवा में उच्छ्वास छोड़ते हैं और देखते हैं
आकाश की ओर

इन्हें लगता है कि आकाश की आँखें हैं।
आकाश अपनी आँखों से निहारता है गमपुर को
ऐसे जैसे एक वही जानता हो गमपुर को!

इस बीच जब कोई उन्हें हिलाता है तो वह चौक पड़ते हैं और हँस देते हैं

चूँकि उन्हें कठिन दिनों में हँसने के सिवा कुछ नहीं आता
इसलिए वह बहुत बार
कुछ भी न कहकर बस हँस देते हैं।

हँसी उनकी भाषा का सबसे सुंदर शब्द है जिसके लिए बहुत बार उन्हें ज़रूरत नहीं पड़ती संसार की किसी भी भाषा की।

गमपुर के लोग अ-परिचय को पछाड़कर
ढूँढ लेते हैं परिचय से भरा हुआ
एक ब्रह्माण्ड!

वह ढूँढने की तमाम प्रक्रियाओं में बार-बार ढूँढ लेते हैं ‘ख़ुद’ को
और तब एक बहुत बड़ी दुनिया बेहद मामूली हो जाती है उनके लिए

उच्छ्वासों और हँसी की भाषा से वह बार-बार हरा देते हैं उस राजकीय अभिलेख को,
जिसमें एक भाषा थोड़ी बेहया होते हुए बहुत कठोरता से कहती है
कि उद्दण्ड हैं गमपुर के लोग!

मछलियों का शोक गीत

झपटकर धर नहीं लेती कुटुमसर की गुफा में दुबककर बैठी अंधी मछलियाँ अपनी जीभ पर
समुद्र के खारे पानी का स्वाद
इनकी गलफड़ों पर अब भी चिपका है वही
हज़ारों वर्ष पूर्व का इतिहास!

कि ‘कांगेर घाटी’ में उड़ने वाली गिलहरी के पंखों पर
अक्सर उड़ेल आती हैं मछलियाँ
संकेत की भाषा में लिखी अपनी दर्द भरी पाती की स्याही ताकि बचा रहे गिलहरी के पंखों का चितकबरापन

बोलने वाली मैना को सुबक-सुबककर सुनाती हैं
काली पुतलियों की तलाश में भटकती अपनी नस्लों के संघर्ष की कहानी
ताकि मैना का बोलना जारी रहे पलाश की सबसे ऊँची टहनी से

मछलियाँ तो अंधी हैं पर
लम्बी पूँछ वाला झींगुर भी नहीं जान पाया अब तक कुटुमसर गुफा के बाहर ऐसी किसी दुनिया के होने का रहस्य
जहाँ बिना पूँछ वाले झींगुर चूमते हैं सुबह की उजली धूप
और टर्र-टर्र करते हुए गुज़र जाते हैं
कई-कई मेढकों के झुंड

गुफा के भीतर
शुभ्र धवल चूने के पत्थरों से बने झूमरों का संगीत सुनकर
अंधी मछलियाँ भी कभी-कभी गाने लगती हैं
घोटुल में गाया जाने वाला
कोई प्रेम गीत!
गुफा के सारे पत्थर तब किसी वाद्ययंत्र में बदल उठते हैं
हाथी की सूंड की तरह बनी हुई
पत्थर की सरंचना भी झूम उठती है

संगीत कितना ही मनमोहक क्यों न हो
पर एक समय के बाद
उसकी प्रतिध्वनियाँ कर्कशता में बदल जाती है

मछलियाँ अंधी हैं
बहरी नहीं
कि मछलियाँ जानती हैं सब कुछ
सुनती हैं सैलानियों के पदचाप
सुनती हैं उनकी हँसी, ठिठोली
जब कोई कहता है
देखो-देखो यहाँ छुपकर बैठी हैं
ब्रह्माण्ड की इकलौती रंग-बिरंगी मछली।

तब भले ही कुटुमसर गुफा का मान बढ़ जाता हो
कार्ल्सवार गुफा से तुलना पर
कुटुमसर फूला नहीं समाता हो
तब भी कोई नहीं जानना चाहता
इन अंधी मछलियों का इतिहास
कि
जब कभी होती हैं एकान्त में
तब दहाड़े मार कर रोती हैं मछलियाँ
इनकी आँखों से टपकते आँसुओं की बूँद से चमकता है गुफ़ा का बेजान-सा शिवलिंग!

कोई नहीं जानता पीढ़ियों से घुप्प अंधेरों में छटपटातीं
इन अंधी मछलियों का दर्द

लिंगोपेन से माँग आयीं अपनी आज़ादी की मन्नतें
कई-कई अर्ज़ियाँ भी लगा आयीं बूढ़ादेव के दरबार में

अंधी मछलियाँ जानती हैं
उनकी आज़ादी को हज़ारों वर्ष का सफ़र तय करना
अभी बाक़ी है
इसलिए भारी उदासी के दिनों में भी
कुटुमसर की मछलियाँ
सायरेलो-सायरेलो जैसे गीत गाती हैं!

मछलियाँ गायेंगी एक दिन पंडुमगीत

तुम्हें छूते हुए थरथरा रहे हैं मेरे हाथ
कि कहीं किसी ताज़े ख़ून का धब्बा न लग जाए मेरी हथेलियों पर
सोचती हूँ तुम्हारी नींव रखी गई थी
तब भी क्या तुम इतनी ही डरावनी थीं।

अत्ता बताती है तुम्हारे आने की ख़बर से
सारा गाँव हथेलियों पर तारे लिए घूम रहा था
उम्मीद की हज़ारों-हज़ार झालरें
लटक रही थीं घर की छानियों पर
सुअर की बलि संग देशी दारू का भोग
लगाया गया था तुम्हें
ख़ूब मान, जान के साथ आयी थीं तुम
तुम्हारे आने से तालपेरु* का सीना
फूलकर और चौड़ा हो गया था।

तुम आयीं तो अपने संग, सड़क, बिजली, पानी, अस्पताल, स्कूल, हाट, बाज़ार के नये मायने लेकर आयीं

गाँव अचानक शहर की पाठशाला में दाख़िल हो चुका था।
हित-अहित, अच्छा-बुरा, नफा-नुकसान, हिंसा-अहिंसा का पाठ पढ़कर
होमवर्क भी करने लगा था पूरा गाँव।

किसी कल्पवृक्ष की भाँति
बाहें पसारे तुम खड़ी रहतीं
और पूरा गाँव दुबककर सो जाता
तुम्हारी बाहों के नरम गद्दे पर
एक निश्चिंतता भरी नींद
सूरज के उगने तक

सालों बाद लौटकर
जब आयी हूँ तुमसे मिलने
तो देखती हूँ
हज़ारों गुनाहों की साक्षी बन तालपेरु की रेतीली छाती पर
खंडहर-सी बिछी हो तुम।
साईं रेड्डी# के ख़ून के छींटे तुम्हारी निष्ठुरता की कहानी कहते हैं।

तुम्हारी सुखद कहानियाँ
इतिहास के पन्नों पर
किसी फफोले की तरह जल रही हैं।

क्या कभी लौटकर आओगी तुम
तालपेरु नदी के ठण्डे पानी का स्पर्श करने

बोलो कुछ तो बोलो
तुम्हारा यूँ निःशब्द होना
बासागुड़ा की आने वाली पीढ़ियों के मस्तिष्क में गर्म ख़ून का बीज बोने जैसा है।

तुम चीख़ो, तुम चिल्लाओ, तुम रोओ, तुम माँगो इनसाफ़
कि तुम्हारी चुप्पी तोड़ने से ही टूटेगा जंगल का चक्रव्यूह

तुम कुछ बोलो मेरे प्रिय पुल^,
कि तुम्हारी खनकती आवाज़ सुनकर
जंगल से हिरणों का झुंड पानी पीने ज़रूर आएगा।
उस दिन तालपेरु की सारी मछलियाँ तुम्हारे स्वागत में एक बार फिर पंडुमगीत गायेंगी।

तुम देखना,
एक दिन तुम सजोगी फिर किसी नयी दुल्हन की तरह।

*तालपेरु—बैलाडीला से निकलकर बासागुड़ा होते हुए बहने वाली नदी।
#साईं रेड्डी—बीजापुर के चर्चित पत्रकार जिनकी उसी पुल पर कुल्हाड़ी मारकर हत्या कर दी गई थी।
^बासागुड़ा का पुल—एक गाँव को ज़िले से जोड़ने के लिए बनाया गया ख़ूबसूरत पुल, जिस पर कभी पूरा गाँव एकजुट होकर सुबह शाम गुज़ारा करता था। कहते हैं बहुत रौनक़ होती थी एक समय इस पुल पर, सलवाजुड़ुम के दौरान बासागुड़ा गाँव पूरी तरह ख़ाली हो गया था अब धीरे-धीरे जीवन की कुछ उम्मीदें फिर से वहाँ पनपने लगी हैं पर अब भी कुछ कहना मुश्किल है।

लाल मिट्टी का दर्द

जैसे कोई पंडरी लेकी भित्तिचित्र उकेरते हुए गाती है
रानो बेलो रे, रानो बेलो रे…
जैसे कोई वन भैंसा लड़ता है आखेट नृत्य में तीर की नोक से
जैसे कोई लेका झपटकर धर लेता है धुंगिया अपनी जीभ पर
जैसे कोई लमझना डूबकर उभरता है प्रेम में
जैसे कोई पगडंडी भागती है सड़क से दूर
जैसे कोई दण्डामि-माड़िया नृत्य से पहले धारण करना चाहता है गौर-सींग
जैसे कोई स्वाद घोलता हो इंडीपुड़ी* करी में
जैसे कोई पढ़ता हो पदिओरा# इतिहास पहाड़ की तलहटी में
जैसे कोई लिंगो उठा ले जाता हो पुसबाका^ की परियों को ख़ून से लथपथ
जैसे कोई पीता हो लिंगागिरी की ताड़ी मदहोश होकर
जैसे कोई मछुवारा फँसाता हो बड़ी मिन्नत के बाद तालपेरु नदी की मछलियाँ
जैसे कोई पकाता हो कड़कनाथ मुर्ग़ा चूल्हे की धीमी आँच पर
जैसे संगम में उगता सूरज भद्रकाली मंदिर की मुंडेर को छूता हो
जैसे युधिष्ठिर बैठे हों ऊँची पहाड़ी पर धर्म की प्रतीक्षा में
बस वैसे ही ताज़ा सल्फी की तरह
गट-गट की आवाज़ के साथ
मैं भी पी जाना चाहती हूँ लाल मिट्टी का दर्द।

*इंडीपुड़ी—छिंद के पेड़ में पलने वाला कीड़ा।
#पदिओरा—हमारा इतिहास।
^पुसबाका—बीजापुर का एक गाँव जहाँ आदिवासी महिलाओं का बलात्कार हुआ।

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