कविता

‘जीवन के दिन’ से कविताएँ

कविता संग्रह: 'जीवन के दिन' - प्रभात चयन व प्रस्तुति: अमर दलपुरा याद मैं ज़मीन पर लेटा हुआ हूँ पर बबूल का पेड़ नहीं है यहाँ मुझे उसकी याद...

गाँव में गुंवारणी का आना

बेमौसम की तरह सिर पर गठरी लिए चली आती है गाँव में गुंवारणी जैसे बेमौसम आती हैं आँधियाँ जैसे बेमौसम गिरती है बर्फ़ जैसे बेमौसम होती है बारिश जैसे...

बादल होता नाव

बादल होता नाव उसमें बैठकर मैं घूमता आकाश सागर में जब मन करता उतरता बूँदों के पैराशूट से गिरता समाता मुँह खोले बैठी धरा पर उगता फिर फ़सल...

अपनी ज़मीन तलाशती बेचैन स्त्री

यह कैसी विडम्बना है कि हम सहज अभ्यस्त हैं एक मानक पुरुष-दृष्टि से देखने स्वयं की दुनिया मैं स्वयं को स्वयं की दृष्टि से देखते मुक्त होना चाहती हूँ...

गोबिन्द प्रसाद की कविताएँ

आने वाला दृश्य आदमी, पेड़ और कव्वे— यह हमारी सदी का एक पुराना दृश्य रहा है इसमें जो कुछ छूट गया है मसलन पुरानी इमारतें, खण्डहरनुमा बुर्जियाँ और किसी...

आग का पर्याय है कविता

मैं शब्दों पर शब्दों का ढेर लगाता हूँ उपमाओं की उपमाओं से अलंकारों की अलंकारों से बनाता चलता हूँ शृंखला जो और जैसे भी छंद अँटते व जँचते ही नहीं बल्कि ख़ुद...

वह भला आदमी

वह भला-सा आदमी हमारे बीच की एक इकाई बन कल तक हमारे साथ था। वह चौराहे के इस ओर मुँह में पान की गिल्लोरियाँ दबाए चहका करता था यहाँ-वहाँ खादी...

सात सुरों में पुकारता है प्यार

माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी जोगी शिरीष तले मुझे मिला सिर्फ़ एक बाँसुरी थी उसके हाथ में आँखों में आकाश का सपना पैरों में धूल और घाव गाँव-गाँव वन-वन भटकता...

सीढ़ी के डण्डे

तुम्हारी नज़र में हम आदमी नहीं सीढ़ी के डण्डे भर रह गए हैं जिन पर पाँव धर-धरकर सत्ता की आलिशान इमारत पर चढ़ जाते हो फिर, उन्हें भारी जूते वाले पैर...

साबुतपन

पुरुष की नज़र में नमक होती है स्त्री बिना जिसके बेज़ायका ज़िन्दगी, करता है इस्तेमाल स्वादानुसार न ज़्यादा, न कम हरदम। वह नयी-नयी चीज़ों में रमाता है मन बदलता है स्वाद ख़ुश होता है ख़ामख़ा अहसास से पर...

समन्दर

स्त्री सिर्फ़ नमक नहीं कि मनमाफ़िक इस्तेमाल कर बन्द कर डिब्बे में सजा दी जाए रसोई के किसी कोने में खाने की किसी टेबल पर। वह लहराता समन्दर है असीम सम्भावनाओं का पनपते हैं जहाँ अनमोल...

नवयुग आया

सूरज डूबा साँझ हुई गुवाले आए गाँव में, चन्दा सोया तारे नाचे घुँघरू बाँधे पाँव में। चौपालों पर बूढ़े बैठे चर्चाओं का दौर है, लूटपाट और तोड़-फोड़ का गाँव-गाँव में शोर है। पानी महँगा ईंधन महँगा यह कैसा...

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